मौर्यकाल के बाद भारत में बौद्ध धम्म की स्थिति

बुद्ध के जीवन काल में बौद्ध धम्म जीवन की एक महत्वपूर्ण जीवनशैली बन चुका था। उनके बाद अशोक ने धम्म को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। मौर्य काल (वृहद्रथ की हत्या के) बाद कहा जाता है कि बौद्ध धम्म समाप्त हो गया था, परन्तु ये कथन ग़लत है। मौर्य काल के बाद भी कई शताब्दियों तक भारत में बौद्ध धम्म अपने चर्मोत्कर्ष पर था, खूब फला-फूला और फैला।

भारत का लोकतंत्र संकट में

Four Crises of Indian Democracy

भारत की चुनावी प्रक्रिया, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और नागरिक स्वतंत्रता पर गहरे सवाल। जानिए कैसे लोकतंत्र खतरे में है और नागरिक समाज इसकी रक्षा के लिए क्या कर रहा है।

भ्रष्टाचार: जब बीमारी नहीं, व्यवस्था ही बन जाए

भ्रष्टाचार: जब बीमारी नहीं, व्यवस्था ही बन जाए

भारत में भ्रष्टाचार अब अपराध नहीं माना जाता। भ्रष्टाचार अब एक कौशल मान लिया गया है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लाया गयी भाजपा सरकार ने आप इसे संस्थागत मान्यता प्रदान कर दी है।

वोटर सूची में अनियमितताएँ और चुनावी पारदर्शिता पर सवाल

वोटर लिस्ट से पात्र लोगों के नाम हटाना और उसमें फर्जी काल्पनिक लोगों के नाम जोड़ना, अस्तित्व विहीन घरों में हजारों फर्जी वोटरों को पैदा करना, एक ही नाम को कई प्रदेशों की वोटर लिस्ट में पाये जाने के काम में चुनाव आयोग ने विशेषज्ञता हासिल की है।

जब शिक्षा इंसानियत भूल जाए: हिटलर से आज का सबक

क्या हम भी हिटलर जैसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं? अगर शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा, लालच और सत्ता का साधन बनकर रह जाएगी तो भविष्य का भारत संवेदनशील नागरिकों का नहीं, बल्कि “डिग्रीधारी मनोरोगियों” का समाज बन जाएगा।

संसद में पेश 130 संविधान संशोधन बिल: लोकतंत्र की हत्या कानून से वैधता

यह 130वां संविधान संशोधन विधेयक सत्ता की नैतिकता नहीं, बल्कि विपक्ष को समाप्त करने का औज़ार है। गिरफ्तारी को दोषसिद्धि से ऊपर रखकर यह लोकतंत्र की जड़ें खोदता है और संघीय ढाँचे को खोखला करता है। भारत बहुदलीय लोकतंत्र से एकदलीय शासन की ओर।

सलामी स्लाइसिंग: मोदी सरकार और RSS की राजनीति का छुपा हुआ हथियार

लोकतंत्र कभी अचानक ढहता नहीं, वह धीरे-धीरे भीतर से खोखला किया जाता है। मोदी सरकार और RSS ने इसे “सलामी स्लाइसिंग” की कला बना दिया है—छोटे-छोटे बदलाव, जो मामूली लगते हैं, लेकिन मिलकर संविधान, संस्थाएँ और नागरिक अधिकारों की नींव हिला देते हैं। असली खतरा यही है कि जब जनता को पूरा सच समझ आएगा, तब तक बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होगा।

स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद: निजता पर नया खतरा

निजता

भारत की आज़ादी को 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन मौजूदा हालात में स्वतंत्रता पर गहरे सवाल खड़े हो रहे हैं। निजता, अभिव्यक्ति और नागरिक अधिकारों पर बढ़ते नियंत्रण ने यह आशंका पैदा कर दी है कि कहीं हमारी लोकतांत्रिक आज़ादी धीरे-धीरे खोखली न हो रही हो। सत्ता और व्यवस्था के दबाव में जनता फिर से एक नए तरह की परतंत्रता की ओर धकेली जा रही है।

उत्तर भारत के पेरियार: ललई सिंह यादव – सामाजिक क्रांति के अथक योद्धा

ललई सिंह यादव (1911–1993), उत्तर भारत के पेरियार, ने “सच्ची रामायण” के प्रतिबंध के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक ऐतिहासिक लड़ाई जीती। बौद्ध धर्म अपनाकर जातिसूचक पहचान छोड़ी और जीवनभर ब्राह्मणवाद के खिलाफ बहुजन मुक्ति आंदोलन चलाया। उनके नाटक, पुस्तकें और प्रकाशन ने सामाजिक न्याय और वैचारिक स्वतंत्रता की नई चेतना जगाई।