(Salami slicing: The hidden weapon of Modi government and RSS politics)

भारत का लोकतंत्र अपनी विविधता, खुलेपन और संवैधानिक मूल्यों पर टिका हुआ है। लेकिन बीते एक दशक में भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को धीरे-धीरे काटने की प्रक्रिया चल रही है। यह प्रक्रिया अचानक, आक्रामक या सार्वजनिक तौर पर नहीं होती, बल्कि बेहद बारीकी से, छोटे-छोटे कदमों में होती है—जिसे रणनीतिक भाषा में “सलामी स्लाइसिंग” कहा जाता है।

सलामी स्लाइसिंग क्या है?

“सलामी स्लाइसिंग” का मतलब है किसी बड़े उद्देश्य को हासिल करने के लिए उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर, एक-एक करके लागू करना। इस तरह हर कदम अपने आप में मामूली दिखता है, लेकिन धीरे-धीरे मिलकर वे किसी बड़े बदलाव में बदल जाते हैं।

  • जैसे सलामी (एक प्रकार का मीट) को बारीक टुकड़ों में काटते हैं—हर स्लाइस छोटा है, दिखने में सामान्य है, लेकिन पूरा सलामी धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।
  • राजनीति और शासन में इसका मतलब है: संविधान, संस्थाएँ और अधिकार एक झटके में नहीं छीने जाते, बल्कि क्रमशः क्षीण कर दिए जाते हैं।

RSS और मोदी सरकार ने इस रणनीति को अपनाकर भारतीय लोकतंत्र के कई स्तंभों को धीरे-धीरे कमजोर किया है।

1. सार्वजनिक उपक्रमों का क्रमिक निजीकरण

मोदी सरकार के पहले ही कार्यकाल से ही यह एजेंडा स्पष्ट था कि सरकारी कंपनियाँ निजी हाथों में सौंप दी जाएँगी। लेकिन यह काम अचानक नहीं किया गया।

  • पहले “अप्रभावी कंपनियों” की बात आई।
  • फिर घाटे वाले उपक्रमों को बेचने का तर्क दिया गया।
  • उसके बाद लाभदायक कंपनियों के हिस्से बेचने शुरू कर दिए गए।
    आज स्थिति यह है कि “सरकारी उपक्रम” नामक अवधारणा ही लगभग समाप्त कर दी गई है।

यह सब एक ही झटके में नहीं हुआ, बल्कि छोटे-छोटे हिस्सों में, ताकि जनता या विपक्ष अचानक बड़े बदलाव को रोक न सके।

2. संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण

लोकतंत्र की रीढ़ स्वतंत्र संस्थाएँ होती हैं—न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया, जांच एजेंसियाँ। मोदी सरकार ने इनमें से किसी को सीधे समाप्त नहीं किया, बल्कि धीरे-धीरे उनकी स्वायत्तता खत्म की।

  • चुनाव आयोग: नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव और सरकार-हितैषी निर्णय।
  • CBI और ED: विपक्षी नेताओं पर केंद्रित कार्रवाई।
  • सुप्रीम कोर्ट: संवेदनशील मामलों में देरी, बेंच गठन पर दबाव।

हर बदलाव अपने आप में छोटा दिखा, लेकिन मिलकर उन्होंने संस्थाओं को निष्क्रिय बना दिया।

3. विधायी प्रक्रिया में सलामी स्लाइसिंग

लोकसभा में बहुमत का सहारा लेकर मोदी सरकार ने कानून पारित करने की प्रक्रिया को ही बदल दिया।

  • राज्यसभा को अप्रासंगिक बनाया गया।
  • कई बिल बिना बहस के पास किए गए।
  • अध्यादेशों का अत्यधिक उपयोग हुआ।

इससे लोकतंत्र का वह मूल भाव, जिसमें बहस, संवाद और असहमति की जगह होती है, धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया।

4. नागरिकता और पहचान की राजनीति

CAA और NRC इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। इन कानूनों को “नागरिकता सुधार” के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन असल में यह नागरिकता की अवधारणा को बदलने का प्रयास था।

  • पहले कहा गया—यह सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आए कुछ शरणार्थियों के लिए है।
  • फिर धीरे-धीरे इसका असर पूरे नागरिक ढाँचे पर पड़ने लगा।
  • NRC की आड़ में लाखों नागरिकों की पहचान पर सवाल खड़े हुए।

हर कदम अपने आप में तर्कसंगत बताया गया, लेकिन मिलकर यह पूरी नागरिकता प्रणाली को हिलाने जैसा है।

5. संविधान की अपर्याप्तता की धारणा

अब सरकार समर्थक बौद्धिक वर्ग यह तर्क देने लगा है कि संविधान “भारतीय परंपरा” के अनुरूप नहीं है।

  • पहले “संशोधन” की बात की गई।
  • फिर यह धारणा गढ़ी गई कि संविधान में इतने संशोधन हो चुके हैं कि अब यह अप्रभावी हो गया है।
  • अब धीरे-धीरे यह विचार सामने रखा जा रहा है कि संविधान की जगह “नया ढाँचा” लाना चाहिए।

यह पूरी प्रक्रिया वही “सलामी स्लाइसिंग” है—एक-एक करके लोकतंत्र की रक्षा करने वाले हर सुरक्षा कवच को हटाना।

निष्कर्ष

RSS और मोदी सरकार का शासन-शैली सीधी टक्कर लेने वाली नहीं है। यह धीरे-धीरे, बारीक और क्रमशः बदलाव लाने वाली है। “सलामी स्लाइसिंग” उनकी राजनीति का मुख्य हथियार है।

  • आज सार्वजनिक उपक्रम लगभग खत्म हो चुके हैं।
  • स्वतंत्र संस्थाएँ निष्प्रभावी हो चुकी हैं।
  • विधायी प्रक्रिया नियंत्रित हो चुकी है।
  • नागरिकता की अवधारणा बदलने की तैयारी है।
  • और अब संविधान को ही अपर्याप्त बताया जा रहा है।

👉 सवाल यह है कि जब तक जनता को इसका अहसास होगा, तब तक क्या बहुत देर हो चुकी होगी?

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