(Renaissance and Dalit-Bahujan education: Layers of a conspiracy)

हिंदी नवजागरण को अक्सर सामाजिक सुधार और जागरूकता के दौर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह कहा जाता है कि इस काल में शिक्षा, स्त्री अधिकार और सामाजिक समानता के विषय पर गंभीर बहसें हुईं। किंतु यदि हम उस समय की पत्र-पत्रिकाओं और प्रमुख साहित्यकारों की मानसिकता पर दृष्टि डालें तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। इस नवजागरण की सुधारवादी परियोजना दरअसल वर्णाश्रम व्यवस्था की पुनर्स्थापना और ब्राह्मणवादी वर्चस्व की रक्षा से प्रेरित थी। विशेष रूप से दलित-बहुजन समुदायों की शिक्षा के प्रश्न पर यह मानसिकता स्पष्ट रूप से सामने आती है।

‘शिक्षा का फल’ : श्रम-सुरक्षा की चिंता

सन् 1914 में स्वदेश बान्धव पत्रिका में प्रकाशित कहानी ‘शिक्षा का फल’ इस मानसिकता का प्रतिनिधि उदाहरण है। इसमें तर्क दिया गया कि शूद्र हिंदू समाज के “पैर” हैं और यदि वे हट जाएँ तो उच्च जातियाँ “गिरकर मर जाएँगी”। कहानी का उद्देश्य शूद्रों की शिक्षा की वकालत करना नहीं, बल्कि यह जताना था कि यदि शूद्र अशिक्षित या असंगठित रहेंगे तो हिंदू समाज की संरचना ढह जाएगी। शिक्षा का अर्थ यहाँ सशक्तिकरण नहीं बल्कि श्रम के निरंतर शोषण को बनाए रखना था। यह समावेश का नहीं बल्कि भय का तर्क था—समाज का अस्तित्व तभी बचेगा जब शूद्र अपनी परंपरागत भूमिकाएँ निभाते रहेंगे।

औपनिवेशिक शिक्षा और दलितों की अनुपस्थिति

औपनिवेशिक हिंदी प्रदेशों की शिक्षा व्यवस्था में दलितों और पिछड़ों की हैसियत नगण्य रही। विद्यालयों और महाविद्यालयों में उनकी भागीदारी लगभग शून्य थी। हिंदू सुधारक वर्ग पिछड़ों को सीमित शिक्षा देने के पक्ष में था, ताकि वे अपने जातिगत व्यवसायों को अधिक दक्षता से निभा सकें। लेकिन दलित समुदाय तो इस विमर्श से पूरी तरह बाहर था।

इस खाली स्थान को भरा ईसाई मिशनरियों और आर्यसमाजी पाठशालाओं ने। मिशनरी विद्यालयों में दलितों और आदिवासियों को प्रवेश दिया गया, पर इसका उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं था, बल्कि धर्मांतरण और पश्चिमी जीवनशैली का प्रचार करना भी था। एंड्यू फ्रेजर जैसे ब्रिटिश पर्यवेक्षकों ने यह दर्ज किया कि भारत के अधिकांश ईसाई “आदिवासी या नीच जाति के हिंदू” थे। वहीं, आर्यसमाज ने भी दलित शिक्षा का अभियान चलाया, पर इसकी मंशा भी उन्हें ‘शुद्ध’ कर हिंदू fold में बनाए रखना और ईसाई प्रभाव से बचाना था। यानी शिक्षा यहाँ भी सामाजिक मुक्ति नहीं, धार्मिक राजनीति का साधन थी।

संस्थागत भेदभाव : ‘जाति विशेष में शिक्षा प्रचार’

संयुक्त प्रांत की शिक्षा नीति में ‘जाति विशेष में शिक्षा प्रचार’ के नाम पर भेदभाव को संस्थागत रूप दिया गया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, जो हिंदी साहित्य के पितामह माने जाते हैं, ने ‘नैनीताल वाली कमेटी’ को जो सुझाव दिए, वे चौंकाने वाले हैं।

उन्होंने कहा कि अछूत बच्चों के लिए स्कूलों में अलग टाट बिछाए जाएँ और उनकी बस्तियों में अलग विद्यालय खोले जाएँ, ताकि उच्च जातियों के बीच कोई विरोध न उत्पन्न हो। यह शिक्षा को समान अधिकार नहीं बल्कि सामाजिक अलगाव की कीमत पर खरीदने का प्रस्ताव था। इससे साफ़ होता है कि सुधारक भी उस समय की जातिवादी दीवारों को तोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे थे, बल्कि उन्हें और मजबूत कर रहे थे।

स्त्री शिक्षा : जाति और व्यवसाय की जकड़बंदी

इस काल में इन्दु (मार्च 1914) में प्रकाशित सांवल जी नागर का लेख ‘आधुनिक स्त्री शिक्षा’ स्त्री शिक्षा को लेकर prevalent सोच का खुलासा करता है। नागर एक समान शिक्षा के घोर विरोधी थे। उनका तर्क था कि यदि सभी जातियों की लड़कियों को एक जैसी शिक्षा दी जाएगी, तो वे अपने पैतृक व्यवसाय—जैसे लोहार, चमार, कुम्हार का काम—छोड़कर अध्यापिका या नर्स बनने लगेंगी। इससे समाज का संतुलन बिगड़ जाएगा।

नागर का सुझाव था कि प्रत्येक जाति की लड़कियों के लिए अलग विद्यालय हों, जहाँ उन्हें केवल उनके “जातीय कर्तव्य” और पारंपरिक पेशे के अनुरूप ही शिक्षा दी जाए। यह स्पष्ट करता है कि स्त्री शिक्षा भी वर्णाश्रम व्यवस्था को बचाए रखने का औज़ार थी। आधुनिकता का अर्थ यहाँ समान अवसर नहीं बल्कि जातिगत बंधनों की पुनर्पुष्टि था।

साहित्यकारों की मानसिकता : वाजपेयी का उदाहरण

हिंदी साहित्य के बड़े आलोचक और साहित्यकार माने जाने वाले नंददुलारे वाजपेयी ने 1927 में निराला को लिखे एक पत्र में साफ़ कहा: “वर्णाश्रम धर्म ही हमारा सर्वस्व है… इसके तोड़ देने से सिवाय हानि के लाभ नहीं।” यह कथन बताता है कि उस दौर के साहित्यिक नेतृत्व की चेतना भी गहरे तक जातिवादी थी।

जिस नवजागरण को आज हम प्रगतिशीलता का दौर मानते हैं, उसके बड़े प्रतिनिधि स्वयं वर्णाश्रम को सामाजिक-धार्मिक अस्तित्व का आधार मान रहे थे। उनके लिए दलित-बहुजन शिक्षा या स्त्री शिक्षा का उद्देश्य बराबरी या स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि जातिगत अनुशासन को बचाए रखना था।

शिक्षा : सुधार या षड्यंत्र?

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी नवजागरण काल का शिक्षा विमर्श दलित-बहुजनों और विशेषकर लड़कियों की उन्नति के लिए नहीं था। यह एक सुविचारित षड्यंत्र था, जिसमें शिक्षा देकर भी स्वतंत्रता छीनी जा रही थी।

  • शूद्रों को शिक्षा दी जाए ताकि वे समाज की “पैर” बने रहें।
  • दलितों को स्कूल में जगह मिले, लेकिन अलग टाट पर बैठकर।
  • लड़कियों को शिक्षा मिले, लेकिन वही जो उन्हें पैतृक व्यवसाय तक सीमित रखे।

इससे साफ़ होता है कि नवजागरण का सुधारवादी चेहरा असल में ब्राह्मणवादी वर्चस्व की रक्षा का औज़ार था।

निष्कर्ष

हिंदी नवजागरण के सुधारक और साहित्यकार एक ओर आधुनिकता और स्वराज की बात करते थे, पर दूसरी ओर उनकी शिक्षा संबंधी नीतियाँ और चिंताएँ वर्णाश्रमी ढाँचे को बचाने के लिए थीं। ‘शिक्षा का फल’, सांवल जी नागर का लेख, द्विवेदी के सुझाव और वाजपेयी का पत्र—ये सभी दस्तावेज़ इस मानसिकता को उजागर करते हैं।

इसलिए दलित-बहुजन दृष्टि से देखा जाए तो यह नवजागरण किसी सामाजिक क्रांति का दौर नहीं बल्कि एक सामाजिक षड्यंत्र था, जिसमें शिक्षा को समानता का साधन बनाने के बजाय उसे भेदभाव, अलगाव और वर्चस्व को बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *