समानता की परछाइयाँ भाग-3

समानता की परछाइयाँ भाग-3

क्या नेतृत्व का असली अर्थ सबको खुश करना है, या सच कहने की हिम्मत रखना—even अगर वह सबको असुविधा में डाल दे? क्या रिश्तों में सच्चाई और बराबरी का मतलब सिर्फ़ बड़े फैसलों में है, या रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में भी इसकी परख होती है? क्या समाज का आईना हमें सही दिखाता है, या हमें ही अपनी परछाई उसमें गढ़नी पड़ती है? क्या समाज का आईना हमें सही दिखाता है, या हमें ही अपनी परछाई उसमें गढ़नी पड़ती है?

समानता की परछाइयाँ भाग-2

समानता की परछाइयाँ, भाग-2

परंपरा बनाम परिवर्तन, नेतृत्व की अग्निपरीक्षा या समानता की परछाइयाँ, किसकी विजय होगी? परिवार का हस्तक्षेप, पिता का पारंपरिक दृष्टिकोण, माँ का भावनात्मक सहारा, नंदिता के लिए क्या अहम् होगा?

समानता की परछाइयाँ भाग-1

समानता की परछाइयाँ

नेतृत्व का अर्थ आदेश देना या सिर्फ़ प्रेरित करना नहीं है। नेतृत्व का असली मतलब है सहयात्रा। पक्षी तभी उड़ सकता है जब उसके दोनों पंख बराबर हों। एक पंख से उड़ान अधूरी है। समाज भी ऐसा ही है। अगर पुरुष और स्त्री, दोनों बराबरी से निर्णय नहीं लेंगे, तो नेतृत्व अधूरा रहेगा।

मेरी कहानी: एक मुलाकात, हजार सपने (भाग-1)

मेरी कहानी: एक मुलाकात, हजार सपने (भाग-1)

यह एक प्रेम कहानी है, दो अजनबी प्रेमियों की, जिनकी मुलाक़ात सोशल मीडिया पर हुई। पहली मुलाक़ात की झिझक से लेकर, सपनों के भरे भविष्य की योजनाओं तक। इनकी यात्रा दो दिलों की कहानी नहीं, बल्कि उन अनकहे वादों की मिशाल है, जहाँ प्यार सिर्फ शब्दों में नहीं बल्कि हर छोटे-बड़े पलों में जिया जाता है।