क्या नेतृत्व का असली अर्थ सबको खुश करना है, या सच कहने की हिम्मत रखना—even अगर वह सबको असुविधा में डाल दे? क्या रिश्तों में सच्चाई और बराबरी का मतलब सिर्फ़ बड़े फैसलों में है, या रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में भी इसकी परख होती है? क्या समाज का आईना हमें सही दिखाता है, या हमें ही अपनी परछाई उसमें गढ़नी पड़ती है? क्या समाज का आईना हमें सही दिखाता है, या हमें ही अपनी परछाई उसमें गढ़नी पड़ती है?
समानता की परछाइयाँ भाग-3
