(एक लघु कथा जो जाति के हस्तांतरण की विरासत को उजागर करती है)

गर्मियों की एक दोपहर थी। पिता और पुत्र खेत में काम कर रहे थे। सूरज सिर पर था और मिट्टी की गंध में पसीना घुल चुका था। तभी बेटे ने अचानक सवाल किया:

“पापा, रमेश मेरे साथ स्कूल में पढ़ता है, खेलता है, और हमेशा होमवर्क में मदद भी करता है… तो फिर आप क्यों कहते हैं कि मैं उसके घर मत जाऊँ?”

पिता का चेहरा एक पल को ठिठका। हल का मूठ कसकर पकड़ते हुए उसने गहरी सांस ली और बोला:

“देख बेटा, वो हमारे जैसे नहीं हैं। उनका खून अलग है, जात नीची है। हमें अपने कुल की शुद्धता बनाए रखनी होती है।”

बेटा थोड़ी देर सोचता रहा। फिर बोला:

“लेकिन रमेश का खून भी लाल है पापा, जैसे मेरा। और उसने तो मुझे अपने घर से ठंडा पानी भी पिलाया था… बहुत इज़्ज़त से।”

पिता की भौंहें तन गईं। अब उनके शब्दों में अनुभव से ज़्यादा डर था:

“यही तो सबसे बड़ा धोखा है बेटा! तू अभी मासूम है, पर दुनिया चालाक है। अगर तू उसके घर जाएगा, उसके साथ खाएगा, खेलेगा, तो फर्क धीरे-धीरे मिट जाएगा। और फर्क मिट गया, तो हमारी जात, हमारा वर्चस्व, हमारी पहचान सब मिट जाएगी।”

बेटा थोड़ा उलझ गया। पूछ बैठा:

“लेकिन पापा, पहचान तो इंसानियत से बनती है ना? और अगर सब बराबर हो जाएँ, तो क्या बुरा है?”

पिता अब पूरी गंभीरता से बोले:

“बेटा, तू जो कह रहा है न, वो सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन दुनिया ऐसे नहीं चलती। ऊँच-नीच बनी रहनी चाहिए, तभी समाज का संतुलन रहता है। जो ऊपर हैं, वही व्यवस्था चलाते हैं। हमें रिश्ते भी अपनी जात में करने हैं, रोटियाँ भी अपनी जात में बेलनी हैं, और राज भी अपनी जात का होना चाहिए। यह जात नहीं, हमारी सत्ता है, हमारा आधार है।”

बेटा चुप हो गया।

सालों बीत गए। वही बेटा अब बड़ा हो चुका था। एक दिन उसने अपने स्कूल जाने वाले बेटे को समझाया:

“देखो, शिवम… वो जो अरुण है ना, उसके घर मत जाया करना। वो हमारे जैसी जात का नहीं है। बातें अच्छी करता है, लेकिन फर्क समझना ज़रूरी है।”


 

विवेचना:

यह कहानी कोई अलंकारिक आख्यान नहीं है, बल्कि समाज की उस अदृश्य दीवार का चित्रण है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मज़बूती से खड़ी की जाती रही है—जाति के नाम पर।

यह ‘खून की शुद्धता’ का झूठा सिद्धांत सिर्फ इसलिए चलाया जाता है ताकि विशेष वर्ग का प्रभुत्व और पहचान सुरक्षित रह सके।

जाति कोई जन्मजात गुण नहीं है, यह प्रशिक्षण है—जो पिता सिखाता है, स्कूल नहीं। यह व्यवस्था न आस्था है, न संस्कृति—यह एक सत्ता-यंत्र है जो लोगों को ऊँच-नीच में बाँटकर, कुछ को ‘ऊपर’ बनाए रखने का औज़ार है।

 

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