भारत के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका पूरा जीवन व्यवस्था की जड़ता को तोड़ने और शोषितों को जागरूक करने में बीतता है। ललई सिंह यादव ऐसे ही संघर्षशील, निर्भीक और वैचारिक योद्धा थे, जिन्हें उत्तर भारत का पेरियार कहा गया।

1 सितम्बर 1911 को कानपुर जिले के कठारा गाँव में एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे ललई सिंह यादव के पिता गुज्जू सिंह यादव एक कर्मठ आर्य समाजी थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे ग्वालियर की सशस्त्र पुलिस बल में सिपाही बने, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन के कारण बर्खास्त कर दिए गए। अपील में बहाल हुए, पर उनका मन हमेशा जनसेवा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में ही लगा रहा। उन्होंने पुलिसकर्मियों की समस्याओं को उठाने के लिए संगठन बनाया और शासन के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की।

1946 में उन्होंने “सिपाही की तबाही” नामक पुस्तक लिखी, जिसमें वार्तालाप शैली में सिपाहियों और उनके परिवारों की बदहाली, शासन की नाकामी और स्वराज की आवश्यकता पर तीखा प्रहार था। यह पुस्तक प्रकाशित तो नहीं हुई, पर टाइप की हुई प्रतियां सिपाहियों में बाँटी गईं। परिणामस्वरूप उन्हें 1947 में गिरफ्तार कर पाँच वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।

वैचारिक पथ और ‘सच्ची रामायण’ विवाद

21 जुलाई 1967 को कुशीनगर में महास्थविर भिक्षु चंद्रमणि के हाथों बौद्ध धर्म दीक्षा लेकर उन्होंने जातिसूचक उपनाम छोड़ने की घोषणा की और मानवतावादी पहचान को अपनाया। इसी दौर में उन्होंने पेरियार ई.वी. रामासामी की पुस्तक “The Ramayana: A True Reading” का हिंदी अनुवाद “सच्ची रामायण” के नाम से किया। 1968 में इसके प्रकाशन के बाद उत्तर भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई। ब्राह्मणवादी संगठनों के दबाव में 8 दिसम्बर 1969 को उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया।

सरकार ने इसे “धार्मिक भावनाओं को भड़काने” का आरोप लगाकर जब्त कर लिया। ललई सिंह यादव ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनके अधिवक्ता बनवारी लाल यादव की दमदार पैरवी के बाद 19 जनवरी 1971 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब्ती आदेश निरस्त कर दिया और सभी जब्त पुस्तकें लौटाने का निर्देश दिया।

सरकार ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाया। “उत्तर प्रदेश बनाम ललई सिंह यादव” के नाम से प्रसिद्ध इस केस में 16 सितम्बर 1976 को न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर, पी.एन. भगवती और सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। यह निर्णय न सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बल्कि प्रगतिशील साहित्य के पक्ष में मील का पत्थर बना।

अन्य पुस्तकें और नाट्य-रचनाएँ

सच्ची रामायण विवाद के बाद भी उन्होंने “धर्म परिवर्तन करें” और “जाति भेद का उच्छेद” जैसी पुस्तकों पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ भी जीत हासिल की। उनके साहित्यिक और प्रकाशन कार्य ने बहुजन विमर्श को नई दिशा दी।

उन्होंने अंगुलीमाल, शम्बूक वध, सन्त माया बलिदान, एकलव्य और नाग यज्ञ जैसे पाँच नाटक लिखे, तथा शोषितों पर धार्मिक डकैती, शोषितों पर राजनीतिक डकैती और सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो? जैसी पुस्तकें रचीं। उनका प्रकाशन संस्थान अशोक पुस्तकालय और सस्ता प्रेस सामाजिक परिवर्तन के हथियार बने।

कंवल भारती के अनुसार, उनका साहित्य हिन्दी साहित्य के समानांतर एक नई वैचारिक क्रांति का साहित्य था, जिसने बहुजन समाज में ब्राह्मणवाद-विरोधी चेतना और श्रमण संस्कृति का नवजागरण किया।

जीवन का अंतिम चरण और विरासत

पेरियार ई.वी. रामासामी की स्मृति सभा में 1974 में जब उन्होंने प्रभावशाली भाषण दिया, तो उपस्थित लोगों ने उन्हें “उत्तर भारत का पेरियार” घोषित किया। इसके बाद यह संबोधन उनकी पहचान बन गया।

उन्होंने बहुजन नायकों, विशेषकर सम्राट अशोक पर व्यापक शोध किया। उनका जीवन साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से उठकर वैचारिक नेतृत्व तक पहुँचने का प्रमाण है कि समर्पण, साहस और संगठन क्षमता से सामाजिक परिवर्तन संभव है।

7 फरवरी 1993 को उनका परिनिर्वाण हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी बहुजन चेतना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ब्राह्मणवाद-विरोधी संघर्ष की प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।

ललई सिंह यादव का जीवन इस तथ्य का जीवंत प्रमाण है कि कलम, विचार और संघर्ष – तीनों मिलकर समाज में वह हलचल पैदा कर सकते हैं, जो पीढ़ियों तक असर छोड़ती है।

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