(Improvement starts with ourselves)
आज के समाज में जब भी नैतिक पतन या सांस्कृतिक विचलन की चर्चा होती है, तो सबसे आसान लक्ष्य ‘स्त्री’ को बना लिया जाता है। उसकी पोशाक, उसकी गतिविधियाँ, उसके सोशल मीडिया पोस्ट – सब कुछ कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि जिसे हम दोषी ठहरा रहे हैं, वह अपने आप कुछ नहीं कर रही – उसकी हर हरकत पर नज़र रखने वाला, उसे वायरल करने वाला, उसे ‘फॉलो’ और ‘लाइक’ करने वाला कौन है? वह हम-ही-तो हैं।
अगर कोई महिला सड़क पर नाच रही है, तो कैमरा कौन चला रहा है? अगर वह इंस्टाग्राम पर अर्धनग्न रील बना रही है, तो उसे मिलियन फॉलोवर्स कौन दे रहा है? अगर कोई वैश्या है, तो ग्राहक कौन है? इन सवालों का उत्तर हम खुद में ही पाएंगे। दोष सिर्फ स्त्री का नहीं है, दोष हमारी दृष्टि, हमारी जिज्ञासा, हमारी दोहरी सोच का है।
यह कहना बहुत सुविधाजनक होता है कि “औरतें बिगड़ गई हैं”, लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि उन्हें देखने वाले “बिगड़े हुए दर्शक” कौन हैं? एक बाजार तभी फलता-फूलता है जब ग्राहक हों। अगर हम इन स्त्रियों के वीडियो देखना बंद कर दें, उन्हें फ़ॉलो करना बंद कर दें, तो यह “डिमांड और सप्लाई” की श्रृंखला स्वतः टूट जाएगी।
🔄 दोहरा मापदंड
हम एक ओर “भारतीय संस्कृति” की दुहाई देते हैं, और दूसरी ओर वही लोग रात को छुपकर इन ‘कन्टेन्ट क्रिएटर्स’ की प्रोफाइल खंगालते हैं। यही तो दोहरापन है जिसकी वजह से समाज में सच्चे सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बनती। यह सुधार तब तक नहीं आएगा जब तक हम खुद को नहीं बदलते।
✅ समाधान की ओर
• नज़र बदलो, नज़ारा खुद बदल जाएगा।
• सोशल मीडिया पर किसी को फॉलो करना या न करना, पूरी तरह से हमारी जिम्मेदारी है।
• अगर अश्लीलता आपको परेशान करती है, तो उसे देखने से इनकार कीजिए।
• महिलाओं को उपभोग की वस्तु न बनाइए। उन्हें इंसान समझिए।
📌 निष्कर्ष
स्त्री को दोष देकर हम अपनी सामाजिक, नैतिक और मानसिक कमजोरी पर पर्दा डालते हैं। सुधार की शुरुआत दूसरों को उपदेश देने से नहीं, खुद की नीयत बदलने से होती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि स्त्रियाँ वैसी ही हैं जैसी समाज उन्हें देखना चाहता है – और इस समाज के निर्माता हम स्वयं हैं।

