(EthosVoice.com के लिए विचारपूर्ण लेख)
आज भारत की राजनीति में धर्म और इतिहास का इस्तेमाल जिस तरह से नफरत और ध्रुवीकरण के लिए हो रहा है, वह न तो नया है और न ही अनदेखा। मुगल शासक औरंगजेब के दौर में भी सत्ता की चुनौतियों के बीच धर्म को राजनीति से जोड़ने की मिसालें मिलती हैं। औरंगजेब ने जहां कई बार कट्टर धार्मिक फैसले लिए, वहीं उन्होंने राजनीतिक कारणों से कई हिंदू राजाओं और मंदिरों का सहयोग भी किया। उनके दरबार में राजा रघुनाथ सिंह और मिर्जा राजा जय सिंह जैसे हिंदू सरदार उच्च पदों पर थे। इससे साफ है कि उनकी नीतियाँ पूरी तरह धार्मिक नहीं थीं, बल्कि सत्ता को मजबूत करने के लिए राजनीति में धर्म का इस्तेमाल था।
- ऐतिहासिक तथ्यों की जटिलता और उसका दुरुपयोग
आज के दौर में फिल्मों और सीरियल्स के माध्यम से इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने का ट्रेंड तेज़ हुआ है। छावा जैसी फिल्में शिवाजी और औरंगजेब के बीच संघर्ष को सांप्रदायिक रंग देकर पेश कर रही हैं, जिससे समाज में मुसलमानों के प्रति नफरत फैले। यह कोई नई रणनीति नहीं—हिटलर ने भी यहूदियों के खिलाफ नफरत बढ़ाने के लिए सिनेमा का उपयोग किया था। भारत में भी फिल्मों के जरिए एक ख़ास राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत किया जा रहा है।
शिवाजी के योगदान को केवल हिंदुत्व के प्रतीक तक सीमित कर देना, या दारा शिकोह को पूरी तरह ‘हीरो’ और औरंगजेब को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करना, ऐतिहासिक यथार्थ के साथ बड़ा अन्याय है। शिवाजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश भी दिया था, और उनका संघर्ष तत्कालीन सत्ता के खिलाफ मराठा स्वराज्य की स्थापना के लिए था, न कि किसी धर्म के खिलाफ।
- शिक्षा में बदलाव और इतिहास से छेड़छाड़
हालिया वर्षों में पाठ्यक्रम से मुगल इतिहास को हटाने की कोशिश और औरंगजेब के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाने की रणनीति ने समाज को और बाँटा है। 1990 के दशक में “बाबर की औलाद” जैसे नारे दिए गए थे, और अब औरंगजेब के बहाने मुसलमानों को ‘गद्दार’ साबित करने की कोशिश हो रही है। यह वही पैटर्न है जो हिटलर के नाजी जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ अपनाया गया था—इतिहास के विकृत संस्करण से नफरत फैलाना।
- सच्चाई और जिम्मेदारी
औरंगजेब का शासन केवल मंदिर विध्वंस या धार्मिक कट्टरता तक सीमित नहीं था। उन्होंने कई हिंदू मंदिरों को दान दिया, प्रशासनिक स्तर पर हिंदू अधिकारियों को महत्व दिया, और धार्मिक के बजाय राजनीतिक कारणों से कठोर फैसले लिए। इतिहास को सिर्फ अच्छाई या बुराई में बांटना उस जटिलता को नकारना है, जिससे समाज सीख सकता है।
लेकिन आज इतिहास का उपयोग सीखने के बजाय, लोगों को डराने-धमकाने और वोटबैंक तैयार करने के लिए किया जा रहा है। यह लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द—दोनों के लिए खतरनाक है।
- निष्कर्ष
हमें इतिहास को राजनीतिक औजार बनाने के बजाय, उसके सही अध्ययन से आज की समस्याओं के हल निकालने चाहिए। फिल्मों, पाठ्यक्रमों और नेताओं के भाषणों के जरिए नफरत पैदा करने से समाज सिर्फ बिखरेगा। इतिहास हमें जो सिखा सकता है, उसे तथ्य और तर्क के आधार पर समझना और सिखाना ही हमारे लिए सही रास्ता होगा। अगर हम एक बेहतर, एकजुट और प्रगतिशील भारत चाहते हैं, तो इतिहास को नफरत नहीं, समझ और संवाद का माध्यम बनाना होगा।

