लोकतंत्र बनाम सत्ता: बदलते सितारे और जागता भारत प्रस्तावना: सत्ता और समय का सबक वक्त किसी का गुलाम नहीं होता। सितारे बदलते रहते हैं। ऊँचाई तक पहुँचना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन वहाँ टिके रहना सबसे कठिन काम है। प्रकृति सिखाती है—फलों से लदा पेड़ झुक जाता है और आँधी में वही पेड़ बचता है जो लचीलापन दिखाता है। राजनीति में भी यही नियम लागू होता है। आज भारत में लोकतंत्र और सत्ता के बीच टकराव साफ दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र संस्थाओं को बचा पाएगा या संस्थाएँ सत्ता की कठपुतली बन जाएँगी? चुनाव आयोग की साख पर संकट लोकतंत्र का स्तंभ है स्वतंत्र चुनाव। लेकिन चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं।
- वोटर लिस्ट में गड़बड़ी,
- EVM मशीनों पर अविश्वास,
- और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी।
- पाकिस्तान जैसे छोटे देश की चुनौतियाँ,
- चीन के साथ सीमा विवाद और झड़पें,
- ड्रोन हमले और जवानों की शहादत।
- सस्ता कच्चा तेल आयात होता है।
- इसे करीबी उद्योगपतियों की रिफाइनरी में प्रोसेस किया जाता है।
- फिर मंत्रियों के बेटों की एथेनॉल फैक्ट्रियों तक पहुँचता है।
- अंततः जनता को महँगा पेट्रोल मिलता है।
- सोशल मीडिया पर सच साझा करें।
- नारे बुलंद करें:
- “वोट चोर!”
- “गद्दी छोड़!”
- उन अधिकारियों का सामाजिक बहिष्कार करें जो लोकतंत्र से खिलवाड़ करते हैं।

