कभी भारत के सार्वजनिक जीवन में मानवाधिकार सबसे जीवंत और सर्वाधिक चर्चित शब्दों में से था। चाहे पुलिस अत्याचार की बात हो, कस्टोडियल डेथ हो, दलित उत्पीड़न हो या स्त्रियों पर हिंसा—हर जगह मानवाधिकार की बहस होती थी। विश्वविद्यालयों से लेकर स्वयंसेवी संगठनों तक, अदालतों से लेकर मीडिया तक, यह शब्द लोकतंत्र की आत्मा की तरह गूंजता था।
लेकिन 2014 के बाद हालात पलट गए। जैसे ही मोदी सरकार सत्ता में आई, सार्वजनिक विमर्श से “मानवाधिकार” शब्द लगभग गायब कर दिया गया। आज थाना हो या संसद, मीडिया हो या सामाजिक आंदोलन—मानवाधिकार अब कहीं सुनाई नहीं देता।
शब्द का राजनीतिक गायब होना
यह कोई संयोग नहीं है। यह सुनियोजित रणनीति है। सत्ता ने “मानवाधिकार” को राष्ट्र–विरोधी विमर्श के रूप में पेश किया।
• मानवाधिकार की बात करने वालों को “देशद्रोही, टुकड़े–टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल” जैसे लेबल दिए गए।
• मीडिया ने इस विमर्श को हाशिए पर धकेलकर “राष्ट्रवाद, आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद” जैसे शब्दों को केंद्र में ला खड़ा किया।
• मानवाधिकार संगठनों की साख पर जानबूझकर कीचड़ उछाला गया, उन्हें विदेशी एजेंट बताया गया।
अभूतपूर्व हनन
मोदी शासन में जो हुआ, वह सिर्फ़ अधिकारों का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का क्षरण है।
• मॉब लिंचिंग: 2015 के बाद से धार्मिक पहचान के आधार पर भीड़ हत्या की घटनाएँ आम हो गईं। जीवनका मौलिक अधिकार और मानवाधिकार दोनों का हनन।
• धार्मिक स्थलों पर हमले: अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर संगठित हमले।
• कस्टोडियल टॉर्चर: हिरासत में मौतों की घटनाएँ बढ़ीं, लेकिन मानवाधिकार आयोग और न्यायपालिका की चुप्पी गहरी होती गई।
• स्वतंत्र आवाज़ों पर प्रहार: पत्रकारों, छात्रों और कार्यकर्ताओं को UAPA, राजद्रोह और आईटी एक्ट जैसे क़ानूनों से दबाया गया।
यह सब उस समय हुआ जब सरकार और उसका समर्थक मीडिया “मानवाधिकार” शब्द को ही सार्वजनिक भाषा से बाहर कर रहे थे।
संस्थागत चुप्पी
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग जैसे संवैधानिक निकायों की भूमिका भी धीरे-धीरे निष्क्रिय हो गई। जो संस्थाएँ कभी जनता और सत्ता के बीच अधिकारों का संतुलन बनाने का काम करती थीं, वे अब महज़ औपचारिकता तक सिमट गई हैं।
लोकतंत्र की आत्मा की वापसी
मानवाधिकार कोई “विदेशी शब्द” नहीं, यह हमारे संविधान का ही विस्तार है।
• मौलिक अधिकारों की रक्षा के बिना लोकतंत्र सिर्फ़ दिखावा है।
• अगर जनता अपने अधिकारों की भाषा बोलना बंद कर देगी, तो सत्ता उसे पूरी तरह मिटा देगी।
• इसलिए ज़रूरी है कि समाज और नागरिक फिर से मानवाधिकार की भाषा को अपनाएँ और इसे अपने विमर्श का केंद्र बनाएँ।
निष्कर्ष
मोदी शासन का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि उसने जनता की चेतना से “मानवाधिकार” शब्द को ही उखाड़ फेंका। यह शब्द लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल था। अगर इसे वापस नहीं लाया गया तो संविधान का ढांचा खोखला होता जाएगा।
अब समय है कि हम सब मिलकर यह पूछें: “कहाँ हैं हमारे मानवाधिकार?” और यह सवाल सत्ता की आँखों में डालकर पूछा जाए।

