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अगर लोकतंत्र को एक खेल मानें, तो उसका सबसे महत्वपूर्ण रेफरी कौन है? भारत में इसका उत्तर है—चुनाव आयोग। यह वही संस्था है जो यह सुनिश्चित करती है कि 140 करोड़ की आबादी में से 96 करोड़ मतदाताओं की आवाज़ सही ढंग से सुनी जाए। यह तय करती है कि 4,600 से अधिक उम्मीदवार और 2,500 से ज़्यादा राजनीतिक पार्टियों के बीच मुकाबला निष्पक्ष हो।
भारत का लोकतंत्र केवल आकार में ही दुनिया का सबसे बड़ा नहीं है, बल्कि इसमें होने वाली पारदर्शिता और निष्पक्षता भी इसे अलग पहचान दिलाती है। और इस लोकतंत्र की धड़कन को चलाए रखने का काम करता है चुनाव आयोग।
चुनाव आयोग की नींव
1950 में स्थापित चुनाव आयोग ने अब तक केंद्र और राज्यों को मिलाकर 400 से अधिक चुनाव कराए हैं। जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, और मतपेटी से लेकर ईवीएम तक, आयोग ने हमेशा यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि हर नागरिक का वोट गिना जाए और हर मत का सम्मान हो।
पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने 1951-52 में देश का पहला आम चुनाव कराया। उस समय 17 करोड़ से अधिक मतदाता थे, जिनमें अधिकतर निरक्षर थे। चुनौतियाँ अपार थीं—मतदाता पंजीकरण, निर्वाचन क्षेत्र बनाना और एक स्वतंत्र चुनाव मशीनरी तैयार करना। सेन ने यह सब कुशलता से किया और पहले दो चुनावों ने भारत को दुनिया के सामने लोकतंत्र का सफल प्रयोग साबित कर दिया।
आपातकाल की कसौटी
1975-77 के आपातकाल में जब प्रेस और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे थे, तब भी चुनाव आयोग ने अपनी निष्पक्षता बनाए रखने की कोशिश की। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत ने आयोग की विश्वसनीयता को और मज़बूत किया।
हालाँकि, इसके बाद बूथ कब्ज़ा और मतपत्र भराई जैसी गड़बड़ियाँ बढ़ीं। इसके जवाब में आयोग ने 1979 में आचार संहिता को और मजबूत किया, ताकि सत्तारूढ़ दल भी चुनाव प्रचार में जवाबदेह रहे।
शेषन का सख्त दौर
1990 का दशक चुनाव आयोग के लिए पुनर्जन्म का समय था। टी. एन. शेषन ने जब मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला तो उन्होंने आचार संहिता को केवल एक नैतिक सलाह नहीं रहने दिया, बल्कि उसे बाध्यकारी नियम बना दिया।
उन्होंने बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बूथ कब्जे पर कड़ी कार्रवाई की, चुनाव स्थगित किए और पुनर्मतदान कराया। शेषन ने साफ कर दिया कि चुनाव आयोग “भारत सरकार का नहीं, बल्कि भारत देश का” है। इस दौर में मतदाता पहचान पत्र की पहल और चुनाव प्रेक्षकों की नियुक्ति जैसे सुधार हुए।
उनकी कार्यशैली ने आयोग की स्वायत्तता और निर्भीकता को नयी पहचान दी।
ईवीएम और संस्थागत मजबूती
शेषन के बाद एम.एस. गिल और अन्य आयुक्तों ने सुधारों को आगे बढ़ाया। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVMs) लागू हुईं, जिससे बूथ कैप्चरिंग जैसी गड़बड़ियों पर अंकुश लगा।
2002 में गुजरात दंगों के बाद जब तत्कालीन सरकार तत्काल चुनाव कराने का दबाव बना रही थी, तब मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने तनावपूर्ण माहौल में चुनाव कराने से इनकार कर दिया। इस फैसले ने आयोग की निष्पक्षता का परचम फिर से ऊँचा किया।
विवाद और गिरती साख
लेकिन हर दौर इतना सशक्त नहीं रहा। आयुक्तों की नियुक्तियों पर सवाल उठे—जैसे नवीन चावला, जिन पर गांधी परिवार के नज़दीकी होने का आरोप था।
पिछले एक दशक में आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उठे। 2019 के आम चुनाव में आचार संहिता के उल्लंघनों पर सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेताओं के खिलाफ कार्रवाई न होने से आयोग पर “पक्षपात” के आरोप लगे। आयुक्त अशोक लवासा ने फैसलों पर असहमति जताई, लेकिन बाद में उन पर और उनके परिवार पर दबाव डाले जाने की खबरें सामने आईं। यह घटना आयोग की स्वतंत्रता पर गहरी छाया छोड़ गई।
नया कानून और नई शंकाएँ
2023 में सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया बदल दी। सर्वोच्च न्यायालय ने एक निष्पक्ष समिति का मॉडल सुझाया था, लेकिन नया कानून सरकार के प्रभाव को और बढ़ाने वाला साबित हुआ।
नए मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं—जैसे “जीरो हाउस” और डुप्लीकेट मतदाता—के आरोप लगे। आयोग का रुख रक्षात्मक और अविश्वसनीय दिखा, जिससे जनता का भरोसा और कमजोर हुआ।
लोकतंत्र का प्रहरी या सत्तारूढ़ दल का खिलाड़ी?
आज चुनाव आयोग एक विश्वसनीयता संकट से गुजर रहा है। सवाल यह है कि क्या यह संस्था अब किसी खास टीम के पक्ष में खेल रही है?
इतिहास गवाह है कि आयोग के पास हमेशा वही शक्तियाँ रही हैं जो टी.एन. शेषन या जे.एम. लिंगदोह के दौर में थीं। फर्क केवल नेतृत्व की नैतिक साहस और निष्पक्षता से कार्य करने की इच्छाशक्ति का है।
भविष्य का रास्ता
भारत के लोकतंत्र की असली ताक़त उसकी संस्थाओं की स्वायत्तता में है। चुनाव आयोग को अपनी गौरवशाली विरासत को याद करते हुए खुद को जनता के प्रति जवाबदेह साबित करना होगा।
लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं पर भरोसे का नाम है जो हर वोट की कीमत तय करती हैं। अगर चुनाव आयोग अपने कर्तव्य का पालन निर्भीकता और ईमानदारी से करता है, तो यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी बना रहेगा। अन्यथा, यह केवल सत्तारूढ़ दल के लिए खेल का मैदान तैयार करने वाला खिलाड़ी बन जाएगा।
निष्कर्ष
भारत का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि चुनाव आयोग अपनी भूमिका किस रूप में निभाता है—लोकतंत्र का रक्षक बनकर या अधिनायकवाद का साधन बनकर।
प्रश्न साफ़ है:
क्या हम अपने रेफरी को मज़बूत बनाएँगे, या फिर उसे खेल का हिस्सा बनने देंगे?

