तथागत बुद्ध का जन्म 2500 वर्ष पूर्व हुआ था. आधुनिक विचारक तथा वैज्ञानिक उनके और उनके धम्म के बारे में क्या कहते हैं? इस विषय पर उनके विचारों को यहां संग्रह किया गया है.
☸️ 1. प्रो. एस.एस. राघवाचार्य कहते हैं- “बुद्ध के जीवनकाल से पहले का समय भारतीय इतिहास का सर्वाधिक अंधकारमय युग था. चिन्तन की दृष्टि से यह पिछड़ा हुआ युग था. उस समय का विचार धर्म-ग्रंथों के प्रति अंधभक्ति से बंधा हुआ था. नैतिकता की दृष्टि से भी यह अंधकारपूर्ण युग था. हिन्दुओं के लिये नैतिकता का अर्थ था धर्म-ग्रंथों के अनुसार यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठानों को ठीक ठीक करना. स्व-त्याग या चित्त की पवित्रता आदि जैसे यथार्थ नैतिक विचारों को उस समय के नैतिक चिंतन में कोई उपयुक्त स्थान प्राप्त नहीं था.”
☸️ 2. माननीय आर.जे.जैक्सन का कहना है- “तथागत बुद्ध की शिक्षाओं की अनुपम विशेषता भारतीय धार्मिक विचारधारा के अध्ययन से ही स्पष्ट होती है. ऋग्वेद की ऋचाओं में हम पाते हैं कि आदमी का विचार स्वयं से अलग, बहिर्मुखी है, उसका सारा चिंतन देवताओं की ओर अभिमुख है. बुद्ध धम्म ने स्वयं आदमी के अन्दर छिपी हुई उसकी अपनी सामर्थ्य की ओर उसका ध्यान आकर्षित किया. वेदों में हमें प्रार्थना, प्रशंसा और पूजा ही मिलती है. बुद्ध धम्म में हमें प्रथम बार चित्त को सही रास्ते पर चलाने के क्रम की शिक्षा मिलती है.”
☸️ 3. माननीय विनवुड रीडे का कथन है-
जब हम प्रकृति की पुस्तक खोलकर देखते हैं, जब हम लाखों वर्षों का खून और आँसुओं में लिखा विकास का इतिहास पढ़ते हैं, जब हम जीवन पर नियन्त्रण करने वाले नियमों को पढ़ते हैं, और उन नियमों को, जो विकास को जन्म देते हैं, तो हमें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि, यह सिद्धान्त कि परमात्मा प्रेम-रूप है, कितना भ्रामक है. हर चीज में बदमासी भरी पड़ी है और अपव्यय का कहीं कोई ठिकाना नहीं है. जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनमें बचने वालों की संख्या बहुत थोड़ी है. समुद्र में देखो चाहे हवा में, चाहे जंगल में, हर जगह यही नियम है, दूसरों को खाओ, तथा दूसरों के द्वारा खाये जाने को लिये तैयार रहो. हत्या ही विकास-क्रम का कानून है. परन्तु बुद्ध ने मानव से मानव को दुःख पहुंचाये जाने वाले कारकों पर बड़ी बारीकी से मनन किया और अपने उपदेशों द्वारा संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये नैतिक नियम बनाये. इन नैतिक नियमों को ही बुद्ध धम्म कहते हैं. बुद्ध धम्म सब धम्मों से कितना भिन्न है. रीडे ने यह बात “Martydom of Man” नामक पुस्तक में कही है.
☸️ 4. डा रंजन राय का कहना है, “उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तीन कानूनों की तूती बोलती थी. किसी ने उन्हें अस्वीकार करने का साहस नहीं किया. ये कानून थे-
(1) जड़ पदार्थ का कानून,
(2) जड़ पदार्थ के समूह का कानून,
(3) शक्ति का कानून.
ये उन कथित आदर्शवादी चिन्तकों के जयघोष थे, जो समझते थे कि ये तीनों अविनाशी हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों के अनुसार ये तीनों कानून सृष्टि के संचालक थे. उन्नीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिकों के अनुसार ये तीनों कानून सृष्टि के मूल तत्व थे. उनका मानना था कि विश्व अविनाशी अणुओं का समूह है. उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में श्री जे.जे. थामस और उनके अनुयाइयों ने अणुओं पर हथौड़े चलाना प्रारंभ किया. आश्चर्य की बात हुई, अणुओं के भी टुकड़े-टुकड़े होने लगे. इनको परमाणु कहा जाने लगा. जिन अणुओं को मैक्लवैल अविनाशी आधार मानते थे, वे खण्ड-खण्ड हो गये. फिर परमाणु के छोटे-छोटे खण्ड हुये- इलैक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रान. इनमें इलैक्ट्रान, प्रोटोन में क्रमसः ऋणात्मक, धनात्मक विद्युत आवेश देखा गया. अविनाशी जड़ पदार्थ-समूह की कल्पना विज्ञान से विदा हुई.
तथागत बुद्ध के अनित्यता के सिद्धांत को समर्थन प्राप्त हुआ. विज्ञान ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि विश्व की गति चीजों के मेल से किसी चीज के बनने , उसके खण्ड-खण्ड हो जाने तथा फिर मिलने के नियमों पर ही आश्रित है.
आधुनिक विज्ञान के अनुसार अंतिम तत्व अनेक होकर एक भासित होने वाला है.
आधुनिक विज्ञान तथागत बुद्ध के अनित्यता तथा अनात्मवाद के सिद्धांत की प्रतिध्वनि है.
☸️ 5. ई.जी.टेलर ने अपने Buddhism and Modern Thought में लिखा है –
बहुत समय से आदमी बाहरी ताकतें के शासन में रहा है. यदि उसे सच्चे अर्थ में सभ्य बनना है तो उसे अपने ही नियमों द्वारा अनुशासित रहना सीखना होगा. बौद्ध धम्म ही वह प्राचीनतम नैतिक प्रणाली है, जिसमें आदमी को स्वयं अपना अनुशासक बनने की शिक्षा दी गयी है. इसीलिये इस प्रगतिशील संसार को बौद्ध धम्म की आवश्यकता है, ताकि वह श्रेष्ठतम शिक्षा प्राप्त कर सके.
☸️ 6. ईसाई धर्म के यूनिटेरियन समप्रदाय के पादरी लेसली बोलटन का कथन है- बौद्ध धम्म में आध्यात्मिक मनोविज्ञान को मैं बहुत महत्वपूर्ण योगदान मानता हूँ. बौद्धों की तरह हम यूनिटेरियन सम्प्रदाय के मानने वाले भी परंपरा, पुस्तकों व मतों के बाह्य अधिकार को प्रमाण नहीं मानते. हम आदमी के भीतर ही मार्गदर्शक प्रदीप देखते हैं. यूनिटेरियन मत के अनुयाइयों को ईसा और बुद्ध श्रेष्ठ जीवन के श्रेष्ठ व्याख्याकार प्रतीत होते हैं.
☸️ 7. प्रो. डेविट गोडर्ड का कथन है-
संसार में जितने भी धर्म संस्थापक हुये हैं, उनमें बुद्ध को ही यह गौरव प्राप्त है कि उन्होंने आदमी में मूलतः विद्यमान उस निहित शक्ति को पहचाना, जो बिना किसी बाह्य निर्भरता के उसे निर्वाण के पथ पर अग्रसर कर सकती है.
किसी वास्तविक महान पुरुष का महात्म्य इसी बात में है कि वह महानता की कितनी मात्रा में महानता की ओर अग्रसर करता है, तो तथागत से बढ़कर दूसरा कौन सा आदमी महान हो सकता है?
बुद्ध ने किसी बाह्य शक्ति को आदमी के ऊपर बिठाकर उसका दर्जा नहीं घटाया, बल्कि उसे प्रज्ञा और मैत्री के शिखर पर ले जाकर बिठा दिया है.
☸️ 8. बुद्धिज्म ग्रंथ के लेखक श्री ई.जे.मिलर का कहना है-
किसी दूसरे धम्म में विद्या को इतना महत्व नहीं दिया गया और अविद्या की इतनी भर्तस्ना नहीं की गयी, जितनी बुद्ध धम्म में.
कोई दूसरा धम्म अपनी आँख खुली रखने पर इतना जोर नहीं देता.
किसी दूसरे धम्म ने आत्म-विकास की इतनी विस्तृत, इतनी गहरी तथा इतनी व्यवस्थित योजना पेश नहीं की.
☸️ 9. अपने बुद्धिस्ट इथिक्स में प्रो.डब्ल्यू. टी.स्टास ने लिखा है-
बौद्ध धम्म का नैतिक आदर्श पुरुष अर्हत न केवल सदाचार की दृष्टि से, बल्कि मानसिक विकास की दृष्टि से भी महान है. वह दार्शनिक और श्रेष्ठ आचारवान दोनों एक साथ है.
बौद्ध धम्म ने विद्या को मुक्ति के लिये, तथा अविद्या, तृष्णा को निर्वाण के लिये प्रधान बाधक कारण स्वीकार किये हैं.
इसके विरुद्ध ईसाई आदर्श पुरुष के लिये ज्ञानी होना कभी आवश्यक नहीं माना गया. क्योंकि ईसा का अपना स्वरूप ही अदार्शनिक था. इसलिये ईसाईयत में दार्शनिकता का आदमी की नैतिकता से कोई संबंध नहीं माना गया.
संसार के दुःखों के मूल में शरारत से कहीं अधिक अज्ञान और अविद्या ही है. तथागत बुद्ध ने इसके लिये जगह नहीं रखी.
इन महान विचारकों ने बुद्ध धम्म को कितना महान और अनुपम माना, आपने अभी पढ़ा.
कौन है जो येसे तथागत बुद्ध को अपना शास्ता स्वीकार न करना चाहेगा.

