(एक ऐतिहासिक विरासत, एक समकालीन संकट)

✦ प्रस्तावना: लोकतंत्र और बहुलता—सहयात्रा या संघर्ष?

आधुनिक लोकतंत्र को अक्सर बहुलतावाद और समावेशन के आदर्शों के साथ जोड़ा जाता है। परंतु इतिहास पर जब गहरी दृष्टि डालते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास उन परिस्थितियों में हुआ जब कई समाज धार्मिक रूप से एकरूप बनाए जा रहे थे—और वह भी एक योजनाबद्ध ‘विलोपन’ के माध्यम से।

पश्चिमी यूरोप में लोकतंत्र की जो परंपरा विकसित हुई, वह दरअसल यहूदियों और मुसलमानों के निष्कासन की पृष्ठभूमि में उभरी। आज जब धार्मिक विविधता के प्रश्न पर लोकतंत्र की स्थिरता एक बार फिर चुनौती में है, तो इतिहास से उपजे इस विरोधाभास को समझना न केवल आवश्यक है, बल्कि राजनीतिक रूप से अत्यंत निर्णायक भी।

✦ इतिहास की पृष्ठभूमि: बहिष्करण से बनी “एकता”

13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच इंग्लैंड, फ्रांस, और स्पेन जैसे देशों ने यहूदियों और मुसलमानों को क्रमशः निष्कासित किया। 1290 में इंग्लैंड से यहूदियों के निष्कासन के ठीक बाद Model Parliament की स्थापना हुई। फ्रांस में 1306 में यहूदियों को निकाला गया और उसी के दौरान Estates General नामक संसद बनी।

यह कोई संयोग मात्र नहीं था। धार्मिक समरूपता ने सामाजिक और राजनीतिक सहमति को आसान बनाया। बहुसंख्यक ईसाई समाज में बिना धार्मिक मतभेदों के, प्रतिनिधित्व आधारित शासन प्रणाली का प्रयोग अपेक्षाकृत सुगमता से हो सका। परंतु यह लोकतांत्रिक संरचना समावेश नहीं, बल्कि बहिष्करण पर टिकी थी।

✦ लोकतंत्र और कैथोलिक चर्च: दोहरा चेहरा

कैथोलिक चर्च ने प्रारंभिक लोकतांत्रिक संस्थाओं को नैतिक वैधता दी, साथ ही राजसत्ता की सीमाएं निर्धारित करने में भी भूमिका निभाई। मैग्ना कार्टा जैसे दस्तावेज़ शासकों की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ यहूदियों के आर्थिक अधिकारों को सीमित करने वाले प्रावधान भी शामिल करते हैं।

चर्च के प्रतिनिधि संसदों में स्थान पाते थे, पर वे गैर-ईसाइयों के निष्कासन के सबसे मुखर समर्थक भी थे। इस प्रकार धर्म और लोकतंत्र का प्रारंभिक गठबंधन एक ‘कंडीशन्ड डेमोक्रेसी’ था—जिसकी शर्त थी धार्मिक समरूपता।

✦ विविधता और विघटन: रूस और उस्मानी साम्राज्य के अनुभव

जब हम धार्मिक विविधता वाले समाजों की ओर देखते हैं—जैसे कि ज़ारशाही रूस या उस्मानी साम्राज्य—तो वहाँ लोकतंत्र की राह अधिक कठिन रही। रूस की डूमा में यहूदी और मुस्लिम प्रतिनिधियों को शामिल किया गया, लेकिन बहुसंख्यक असहिष्णुता और साम्राज्यवादी सोच ने संसद को निष्प्रभावी बना दिया।

उस्मानी साम्राज्य में ईसाई, यहूदी और मुस्लिम सभी को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश हुई, लेकिन लगातार अंदरूनी संघर्षों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर असहमति के चलते यह प्रणाली टिक नहीं सकी। आश्चर्यजनक रूप से जब एक all-Muslim parliament बना, तब राजनीतिक स्थिरता में सुधार देखा गया।

यह उदाहरण इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि धार्मिक विविधता यदि संस्थागत रूप से समाहित नहीं की जाती, तो वह लोकतंत्र को अस्थिर कर सकती है।

✦ समकालीन संकट: धार्मिक विविधता बनाम राष्ट्रवाद

21वीं सदी में पश्चिमी लोकतंत्र एक नई चुनौती से जूझ रहा है—धार्मिक विविधता का पुनर्प्रवेश। मुस्लिम प्रवासियों की बढ़ती संख्या के साथ ही फ्रांस, जर्मनी, इटली, भारत जैसे देशों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान हो रहा है। मरीन ले पेन जैसे नेता इस धार्मिक असंतोष को भुना कर लोकतंत्र को ही बहुसंख्यकवादी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

यही प्रक्रिया अमेरिका में मुस्लिम बैन, भारत में CAA/NRC, और यूरोप में हिजाब बैन जैसी नीतियों में दिखाई देती है—जहाँ धार्मिक पहचान लोकतंत्र की रेखा नहीं, बल्कि सीमा बन रही है।

✦ विचार का द्वंद्व: समरूपता बनाम समावेशन

क्या प्रतिनिधित्व आधारित लोकतंत्र के लिए सांस्कृतिक/धार्मिक समरूपता आवश्यक है? या क्या हम एक ऐसी परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्था बना सकते हैं जहाँ विविधता, खासकर धार्मिक विविधता, राजनीतिक स्थायित्व के साथ सह-अस्तित्व में रह सके?

समाधान केवल संस्थाओं की मजबूती में नहीं, बल्कि बहुसंख्यक चेतना के परिष्कार में है। लोकतंत्र तब ही टिकेगा जब वह केवल संख्या पर आधारित शासन नहीं, बल्कि मानव गरिमा और न्याय पर आधारित संरचना बने।

✦ निष्कर्ष: इतिहास से सबक, भविष्य के लिये चेतावनी

आधुनिक लोकतंत्र का इतिहास, जितना वह स्वतंत्रता और भागीदारी की कहानी है, उतना ही वह बहिष्करण और असहमति के दमन की दास्तान भी है। यदि हम इतिहास से यह नहीं सीखते कि धार्मिक विविधता को समावेशी और न्यायपूर्ण तरीके से कैसे संभालना है, तो हम उसी गलती को दोहराएंगे जो कभी यहूदियों और मुसलमानों के निष्कासन में की गई थी।

लोकतंत्र का भविष्य उस पर निर्भर करता है कि क्या हम ‘एकरूपता के नाम पर असहमति को मिटाने’ की परंपरा को छोड़, ‘विविधता में संवाद’ की नई राजनीति को गढ़ सकते हैं।

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