(एक चेतावनीपूर्ण विचार यात्रा)

भारत को एक समय दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता था — एक ऐसा देश जहाँ बहुसांस्कृतिक समाज में लोकतांत्रिक प्रक्रिया ने सात दशकों तक उल्लेखनीय स्थायित्व और जीवंतता दिखाई। लेकिन आज, भारत को “हाइब्रिड शासन” यानी संकर शासन के रूप में देखा जा रहा है — न तो पूर्ण लोकतंत्र, न ही स्पष्ट अधिनायकवाद। यह सिर्फ एक परिभाषात्मक बदलाव नहीं, बल्कि भारत की राजनीतिक आत्मा और नागरिक स्वतंत्रताओं की गिरावट की गहन तस्वीर है।

लोकतंत्र के ढांचे की स्थिरता बनाम मूल्यों का क्षरण

भारत में लोकतंत्र औपचारिक चुनावी प्रणाली, बहुदलीय प्रतिस्पर्धा और नागरिक शासन जैसे संस्थागत ढांचों पर टिका रहा है। इन संस्थाओं ने आपातकाल (1975-77) जैसे संकटों को भी झेला और लोकतांत्रिक मूल्यों को बहाल किया। परंतु 2014 के बाद, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, लोकतंत्र की बाह्य संरचना तो बनी रही, लेकिन इसके भीतर के स्तंभ — नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक सहिष्णुता, स्वतंत्र मीडिया, और सत्ता पर संस्थागत अंकुश — क्षीण होने लगे।

विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों और स्वतंत्र निगरानी संस्थाओं के अनुसार, भारत अब “आंशिक रूप से स्वतंत्र” देशों की श्रेणी में है। यह बदलाव केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि भारत की 1.4 अरब आबादी को शासन के उस ढांचे में डाल देता है जहाँ असहमति, अभिव्यक्ति और विरोध पर स्पष्ट खतरा मंडराता है।

संस्थाओं की निष्क्रियता और असहमति का दमन

लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं होता — यह जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों का समुच्चय है। भारत में आज विपक्ष को कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से कमजोर किया जा रहा है। राजद्रोह कानून, यूएपीए, और बिना मुकदमे वर्षों तक जेल में रखना अब असहमति दबाने का औजार बन चुके हैं। 2010 से 2021 के बीच राजद्रोह के मामलों में 28% की वृद्धि और यूएपीए के तहत गिरफ्तारी में 72% की वृद्धि चिंताजनक है।

वहीं मीडिया की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति के अधिकार, और विरोध प्रदर्शन जैसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अदृश्य लेकिन ठोस प्रतिबंध हैं। मुस्लिम समुदाय, मानवाधिकार संगठन और पत्रकार आज एक भय के वातावरण में कार्य कर रहे हैं, जहाँ आलोचना को राष्ट्रविरोधी ठहराया जाता है।

हाइब्रिड शासन: लोकतंत्र का छलावा

हाइब्रिड शासन की सबसे बड़ी पहचान यही होती है — लोकतंत्र की भाषा, लेकिन अधिनायकवादी मनोवृत्ति। भारत में आज शासन ‘वोट से वैधता’ पाता है, लेकिन सत्ता का व्यवहार ‘विरोधहीन अधिनायकवाद’ जैसा है। संसदीय कार्यपालिका की जवाबदेही में गिरावट और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं की निष्क्रियता इस बात की पुष्टि करती है कि लोकतंत्र केवल प्रक्रियात्मक रह गया है।

आशा की संभावना: लोकतंत्र पुनर्जीवित कैसे हो?

फिर भी, लोकतांत्रिक पतन एक अपरिहार्य नियति नहीं है। भारत में अब भी चुनाव होते हैं, मतदाता गुप्त रहते हैं, और जन-असंतोष की आवाजें कभी-कभी बुलंद होती हैं — जैसा कि कृषि कानूनों के विरोध ने दिखाया। यह साबित करता है कि भारत के नागरिक अभी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुए हैं।

भारत का लोकतंत्र तभी पुनर्जीवित हो सकता है जब एक मजबूत, संगठित और वैकल्पिक विपक्ष उभरे — जो केवल करिश्माई नेतृत्व पर निर्भर न हो, बल्कि जमीनी संरचना और विचारधारा के स्तर पर संगठित हो। कर्नाटक में कांग्रेस की सफलता और भारत जोड़ो यात्रा इसका संकेत हैं, लेकिन यह लंबी दौड़ है। आम आदमी पार्टी जैसे उभरते दलों के सामने भी यह चुनौती है कि वे अपने दायरे को बढ़ाएं और आत्मनियंत्रण के साथ सत्ता का उपयोग करना सीखें।

भाजपा जैसी सदी-पुरानी संगठित ताकत के सामने टिकने के लिए विपक्ष को वैचारिक स्पष्टता, नैतिक साहस, और सामाजिक समावेशिता की ज़रूरत है।

निष्कर्ष

भारत का लोकतंत्र आज दोराहे पर खड़ा है। एक रास्ता है – विधायी सत्ता का केंद्रीकरण, आलोचना का दमन और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों का विस्तार। दूसरा रास्ता – लोकतंत्र की आत्मा की पुनर्खोज, संस्थाओं का पुनर्निर्माण और नागरिकों के अधिकारों की पुनर्प्राप्ति।

सवाल यह नहीं है कि भारत लोकतंत्र के दायरे से बाहर निकल चुका है — बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत की जनता और विपक्ष इस संकर शासन को पुनः लोकशाही में बदलने का संकल्प ले सकती है। अगर हाँ, तो यह लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। यह तो बस शुरुआत है।

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