(Will reservation make the country dependent?)
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🔹विवाद की शुरुआत
हाल ही में शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने एक सार्वजनिक वक्तव्य में आरक्षण नीति को लेकर कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यदि “अयोग्य व्यक्ति को आरक्षण के नाम पर योग्य पद दे दिया जाए तो इससे देश का बंटाधार हो जाएगा” और “आरक्षण की चपेट में देश परतंत्र हो जाएगा”।
यह कथन कई कारणों से महत्वपूर्ण है—पहला, क्योंकि यह एक धर्मगुरु के मुख से आया है; दूसरा, क्योंकि यह आरक्षण जैसे ऐतिहासिक-सामाजिक मुद्दे को योग्यता बनाम अयोग्यता की संकीर्ण परिभाषा में समेटने का प्रयास करता है; और तीसरा, क्योंकि यह उस दृष्टिकोण को पुनर्जीवित करता है जो ऐतिहासिक वंचना को नज़रअंदाज़ कर आज के सामाजिक न्याय प्रयासों को दोष देता है।
🔹आरक्षण का इतिहास: सामाजिक समता की दिशा में प्रयास
भारतीय संविधान में आरक्षण केवल ‘सहूलियत’ नहीं, बल्कि एक संविधानिक उपचार है। यह उस सदियों पुरानेसामाजिक अन्याय का जवाब है, जिसने वंचित वर्गों को न शिक्षा, न मंदिर, न भूमि, न प्रशासन—कहीं भी भागीदारी का अधिकार नहीं दिया।
डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्होंने स्वयं सामाजिक भेदभाव का गहरा अनुभव किया था, ने आरक्षण को सामाजिक समता की गारंटी माना था। उनका विचार था:
“Equality is not achieved merely by equal laws, but by equal opportunities.”
🔹योग्यता बनाम अवसर: किसकी परिभाषा?
शंकराचार्य का यह तर्क कि आरक्षण से “अयोग्य” लोग “योग्य” स्थानों पर पहुँच जाते हैं, इस प्रश्न को जन्म देता है — योग्यता की परिभाषा क्या है? क्या वह केवल एक परीक्षा में अंक लाना है, या फिर वंचनाओं के बीचटिके रहकर संघर्ष करने की क्षमता भी एक प्रकार की योग्यता है?
उच्चवर्गीय विद्यार्थी को यदि किताबें, कोचिंग, भाषा और वातावरण बचपन से मिला हो और दलित या आदिवासी विद्यार्थी को बचपन से भेदभाव, गरीबी और अपमान झेलना पड़ा हो—तो दोनों को एक ही मापदंड से कैसे मापा जा सकता है?
आरक्षण ‘अयोग्यता का पुरस्कार’ नहीं है, बल्कि ‘वंचना का परिशोधन’ है।
🔹क्या आरक्षण से प्रतिभा की हानि होती है?
यह तर्क भी बार-बार दोहराया जाता है कि आरक्षण से ‘प्रतिभा’ का नुकसान होता है। परंतु, इतिहास और आंकड़े दिखाते हैं कि आरक्षण से आए कई लोगों ने प्रशासन, चिकित्सा, न्यायपालिका, तकनीकी क्षेत्रों में उच्च स्तरीय योगदान दिए हैं।
• UPSC, IIT, AIIMS जैसे संस्थानों में आरक्षण से आए हजारों छात्र-छात्राएं सफल हुए हैं।
• इनमें से अधिकांश पहली पीढ़ी के ग्रेजुएट होते हैं, जो न केवल अपनी स्थिति बदलते हैं, बल्कि अगली पीढ़ी को भी आत्मनिर्भर बनाते हैं।
यदि प्रतिभा केवल ऊँचे तबके की थाती होती, तो आज हम इतने विविध और सक्षम नेतृत्व को न देख पाते।
🔹धर्म और राजनीति का मिश्रण: क्या यह मर्यादा का उल्लंघन नहीं?
शंकराचार्य जी एक धार्मिक संन्यासी हैं। वे वेदांत और अध्यात्म के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ऐसे में यदि वे राजनीति–संश्लिष्ट सामाजिक नीति पर विचार रखें तो वह केवल व्यक्तिगत न होकर एक धार्मिक वैधता जैसा रूप ले लेता है—जो एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में अनुचित है।
क्या यह उचित है कि एक सनातन परंपरा का प्रतिनिधि आरक्षण जैसे संविधानिक उपाय को प्रतिशोध कीभावना और देश की परतंत्रता से जोड़े?
🔹सांस्कृतिक दृष्टि: क्या सनातन धर्म में आरक्षण था?
शंकराचार्य ने दावा किया कि “सनातन धर्म में जीविका जन्म से सुरक्षित थी” — यह कथन एक वर्णाश्रमीसमाज की स्थिति को आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है। किंतु यह नहीं बताता कि:
• शूद्रों को वेदपाठ निषिद्ध था,
• अछूतों को गांव की सीमाओं से बाहर रहना होता था,
• कुछ जातियों को जीवनपर्यंत मैला ढोने, चमड़ा काटने जैसे काम करने पड़ते थे।
यह सामाजिक संरचना ‘सुरक्षा’ नहीं, बल्कि अनिवार्य निर्धारण का ढांचा था। क्या इसी को हम आरक्षण कहेंगे?
🔹निष्कर्ष: सामाजिक न्याय बनाम सत्ता की सुविधा
आरक्षण केवल नीति नहीं, न्याय का साधन है। यह अभी भी एक आंशिक सुधार प्रक्रिया है, जिसने समाज में कुछ दरारें भरनी शुरू की हैं, पर अभी बहुत दूर जाना है।
शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जैसे प्रभावशाली व्यक्ति जब आरक्षण के विरुद्ध बयान देते हैं, तो वे जाने-अनजाने उस सामाजिक वर्चस्व को पुनःस्थापित करने की भूमिका में आ जाते हैं, जो वर्षों से शोषण औरविशेषाधिकार की नींव पर टिका रहा।
समाज को आज प्रतिशोध नहीं, पुनर्संरचना की आवश्यकता है। और पुनर्संरचना बिना समावेश और प्रतिनिधित्व के संभव नहीं।
📌 लेख श्रेणी: सामाजिक नीति | धर्म और राजनीति | भारत का सामाजिक न्याय
🖋️ लेखक: EthosVoice नीति–विचार टीम

