लेखक: (Dr. Lala Ram Ahirwar,)

गाँव की कच्ची पगडंडियों से चलते हुए दादी जब पहली बार शहर आई थीं, तो उन्होंने बड़े गौर से चारों तरफ देखा था—लोग मोबाइल में घुसे थे, बच्चों के हाथ में टैब था, और कोई किसी से सीधे मुँह बात नहीं कर रहा था।
दादी ने धीरे से मुझसे पूछा—
“बेटा, ये सब लोग बात क्यों नहीं करते?”
मैंने हँसते हुए कहा—
“दादी, ये सब मोबाइल में बात करते हैं।”
वो मुस्कराईं—“अरे, हम तो मोहल्ले के चौबारे में बैठकर बात करते थे।”

कुछ दिन तो दादी ने मोबाइल से दूरी बनाए रखी। लेकिन एक शाम जब मैंने उन्हें ‘वीडियो कॉल’ करके उनके गाँव के मंदिर की आरती दिखाई, तो उनकी आँखों में चमक आ गई।
“रे! ये तो पूरा गाँव मेरी हथेली में है!”

वहीं से दादी की डिजिटल यात्रा शुरू हुई।

मैंने उन्हें एक पुराना स्मार्टफोन दिया और थोड़ा-थोड़ा सिखाने लगा—कैसे फोन उठाना है, कैसे फोटो देखनी है, और कैसे मैसेज भेजना है।
शुरू में थोड़ी दिक्कत हुई, पर फिर दादी ने धैर्य नहीं छोड़ा।

तीन महीने बाद…

दादी का खुद का एक व्हाट्सऐप ग्रुप बन गया –
“मेरा सखी मंडल”
जिसमें वो अपनी पुरानी सहेलियों को सुबह-सुबह 🌸 “शुभ प्रभात” भेजतीं।
गुब्बारों वाले जन्मदिन के मेसेज, कबीर के दोहे, हल्दी-दूध के घरेलू नुस्खे और कभी-कभी पुरानी तस्वीरें — उनका फोन अब उनकी डायरी बन चुका था।

एक दिन मैंने देखा कि दादी किसी बच्चे के वीडियो पर कमेंट कर रही थीं –
“शाबाश बेटा! खूब तरक्की करो।”
वो बच्चा उनका पड़ोसी था, जो अब दुबई में नौकरी करता था।

जब मैंने पूछा —
“दादी, अब आपको मोबाइल अच्छा लगने लगा?”
वो मुस्कराईं —
“अब तो मोबाइल मेरा चश्मा है बेटा, इसने मुझे फिर से लोगों से जोड़ा है।”

कभी दादी को टेक्नोलॉजी से डर लगता था, लेकिन आज वे ‘व्हाट्सऐप वाली दादी’ बन चुकी थीं।
हर सुबह सबसे पहले उनका मैसेज आता —
🌞 “आपको सुप्रभात एवं मंगलमय दिन की शुभकामनाएँ

💡 सीख:

प्रौद्योगिकी उम्र नहीं देखती।
अगर प्यार और सब्र से सिखाया जाए, तो हमारे बुजुर्ग भी इस डिजिटल युग में कदम से कदम मिला सकते हैं।
और फिर, दादी जैसी मातृ शक्ति जब टेक्नोलॉजी को अपनाती हैं, तो उसमें सिर्फ सुविधा नहीं, संस्कार भी जुड़ जाते हैं।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *