(India’s global standing: From Tianjin to Unemployment market)

प्रस्तावना

             2024 तक भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को बड़े गर्व से प्रस्तुत किया जाता था—“विश्वगुरु भारत”, “मोदी विश्वनेता” और “भारत का उदय” जैसी संज्ञाएँ बार-बार दोहराई जाती थीं। लेकिन हाल की घटनाएँ, विशेषकर तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ को मिले बराबर के सत्कार ने एक सवाल खड़ा कर दिया है: क्या भारत वास्तव में वैश्विक मंच पर वही शक्ति है, जैसा हमें बताया गया था?

1. तियानजिन का प्रतीकात्मक संदेश

             अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रोटोकॉल और सत्कार सिर्फ औपचारिकता नहीं होते, बल्कि यह संकेत देते हैं कि दुनिया किसी देश को किस स्तर पर रखती है।

          – तियानजिन में मोदी और शरीफ़ को समान स्तर पर रखा जाना इस बात का प्रतीक है कि वैश्विक मंच पर भारत और पाकिस्तान को अब एक ही तराजू में तौला जा रहा है।

          – 2014–2019 के बीच मोदी की छवि एक ग्लोबल स्टेट्समैन की तरह बनाई गई थी। अमेरिका से लेकर जापान और यूरोप तक, मोदी को “मोदी-मैजिक” के साथ पेश किया गया। लेकिन 2025 तक आते-आते यह जादू फीका पड़ चुका है।

2. भारत की आतंकवाद पर दलील का कमजोर होना

             मोदी सरकार का सबसे बड़ा नैरेटिव रहा है—“पाकिस्तान आतंकवाद का पोषक है और भारत उसका पीड़ित है।”

         – लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों को बराबरी से पेश कर रहा है, तो भारत की यह दलील खुद-ब-खुद कमजोर हो जाती है।

          – जब भारत के अंदर अल्पसंख्यकों, असहमति रखने वालों और नागरिक अधिकारों पर सवाल उठ रहे हों, तब दुनिया को भारत का “मॉरल हाई ग्राउंड” कमज़ोर ही दिखेगा।

          – इसलिए आतंकवाद पर मोदी की बातें अंतरराष्ट्रीय मंच पर जोक जैसी लगने का खतरा है।

3. आर्थिक विडंबना: मजदूरों की वैश्विक मंडी

             मोदी सरकार के समर्थक हाल ही में जापान में 50,000 भारतीय मजदूरों की भर्ती को “मास्टरस्ट्रोक” बता रहे थे। लेकिन असल में यह भारत की बेरोज़गारी की करुण गाथा है।

          – एक समय भारत “ज्ञान और टेक्नोलॉजी” निर्यात करने का सपना देखता था, लेकिन आज वह “सस्ता श्रम” उपलब्ध कराने वाला देश बनता जा रहा है।

          – फिलीपींस, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों की अर्थव्यवस्था विदेशी मज़दूरों की कमाई पर टिकी है। क्या भारत भी उसी राह पर जा रहा है?

          – जब करोड़ों युवा बेरोज़गार हों और शिक्षा–स्वास्थ्य प्रणाली चरमराई हो, तो “लेबर-एक्सपोर्टिंग इकोनॉमी” बनने का खतरा वास्तविक हो जाता है।

4. वैश्विक व्यापारिक संकट और भारत की कमजोरी

             आज वैश्विक राजनीति बदल चुकी है। अमेरिका और चीन के बीच टकराव बढ़ रहा है। यूरोप ऊर्जा और सुरक्षा की चुनौतियों से जूझ रहा है।

          – भारत पर पहले ही टैरिफ की मार पड़ चुकी है, जिससे उसके निर्यात पर असर हुआ है।

          – सवाल यह है कि भारत को अपना माल कहाँ बेचना है? क्या उसके पास कोई स्थायी बाज़ार है, या फिर वह सिर्फ बड़ी शक्तियों का ट्रेडिंग पार्टनर बनकर रह जाएगा?

          – आर्थिक कमजोरी का सीधा असर कूटनीति पर पड़ता है। जब आपकी अर्थव्यवस्था मज़बूत नहीं हो, तो आप “ना” कहने की ताक़त खो देते हैं।

5. कश्मीर और अमेरिका की नई रणनीति

             इतिहास गवाह है कि जब भी भारत कमजोर स्थिति में होता है, कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछलता है।

          – अमेरिका अपने नए राजदूत की मदद से कश्मीर को फिर से वैश्विक बहस का हिस्सा बना सकता है।

          – “मानवाधिकार” और “संवाद” के नाम पर भारत पर दबाव बनाया जाएगा।

          – भारत की व्यापार और विदेश नीति को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका वही करेगा, जो बीजेपी अपने राज्यों में “गवर्नरों” के जरिए करती है—कठपुतली नियंत्रण।

6. सामाजिक–राजनीतिक विघटन और आंतरिक कमजोरी

             यह गिरावट सिर्फ सरकार की नीतियों की वजह से नहीं, बल्कि समाज की प्रवृत्ति से भी जुड़ी है।

          – एक ऐसा समाज, जहाँ शिक्षित लोग ग़रीब और अपराधी अमीर हों, वहाँ शिक्षा का आदर्श ध्वस्त हो जाता है।

          – भाड़े के विद्वान, पाखंडी धर्मगुरु और अवसरवादी मीडिया जब जनता को बरगलाते हैं, तब लोकतंत्र की असली ताक़त—जनमत—कमज़ोर पड़ जाती है।

          – यह वही विडंबना है, जिसके कारण भारत अपनी ही मेहनत से अर्जित अंतरराष्ट्रीय इज़्ज़त खो बैठा है।

7. भविष्य की तस्वीर: राशन लाइन या आत्मनिर्भरता?

             भारत आज दो रास्तों पर खड़ा है।—

             1. एक तरफ, 5 किलो राशन की लाइन में खड़े भूखे–नंगे भारतीयों की तस्वीर।

             2. दूसरी तरफ, आत्मनिर्भर और सम्मानित भारत की छवि।

             लेकिन दूसरा रास्ता तभी संभव है जब—

          – शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को प्रचार से ऊपर रखा जाए।

          – कूटनीति हिंदुत्वनैरेटिव पर नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक–सामरिक रणनीति पर आधारित हो।

          – समाज पाखंड और अंधभक्ति छोड़कर यथार्थ को स्वीकार करे।

निष्कर्ष

             भारत ने यह इज़्ज़त खोई है, और यह सच कड़वा है। लेकिन यह भी सच है कि भारत की क्षमता आज भी अपार है।

             सवाल यह है कि क्या हम मज़दूरनिर्यातक अर्थव्यवस्था और राशन कार्ड लोकतंत्र बनकर रहेंगे, या फिर अपने आंतरिक संसाधनों, ज्ञान और लोकतांत्रिक ताक़त से फिर से दुनिया को प्रभावित करेंगे?

             जवाब हमारे पास है—आपके पास भी, और मेरे पास भी।

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