पेरियार बनाम विश्वकर्मा पूजा : तर्क, विज्ञान और मानवतावाद की पुकार
प्रस्तावना
भारत का सामाजिक और राजनीतिक इतिहास केवल स्वतंत्रता संग्राम या संविधान निर्माण तक सीमित नहीं है। यह इतिहास बहुजन समाज के संघर्षों, विद्रोहों और उनके असली नायकों की कहानियों से भी बना है। किंतु, सत्ताधारी वर्गों ने बार-बार षड्यंत्रपूर्वक इस इतिहास को दबाने, विकृत करने और बहुजनों को उनके वास्तविक नेताओं से काटने का काम किया है।
आज जब हम 17 सितंबर को “विश्वकर्मा पूजा” के रूप में देखते हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्यों भारत के अधिकांश त्योहार चंद्र कैलेंडर के अनुसार बदलते रहते हैं, लेकिन विश्वकर्मा पूजा हर साल अंग्रेजी कैलेंडर की एक निश्चित तिथि, 17 सितंबर को ही मनाई जाती है? इस “अपवाद” के पीछे केवल परंपरा या संयोग नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक-राजनीतिक साजिश छिपी हुई है।
असल में, 17 सितंबर तमिलनाडु के महान समाज सुधारक और तर्कवादी विचारक ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ (1879–1973) का जन्मदिन है—वह क्रांतिकारी जिसने जातिवाद, ब्राह्मणवाद और धार्मिक पाखंड के खिलाफ संघर्ष किया। बहुजन समाज को असली नायक से काटने और उसे काल्पनिक देवताओं की पूजा में उलझाने के लिए ही 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा का दिन बना दिया गया।
षड्यंत्र की जड़ें : हावड़ा ब्रिज और एक नकली देवता
औपनिवेशिक काल में कोलकाता में जब हावड़ा ब्रिज का निर्माण शुरू हुआ, तब स्थानीय नाविकों और मल्लाहों की आजीविका संकट में पड़ गई। उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया। अंग्रेजों और उनके सहयोगी भारतीय उच्चवर्णीय सत्ताधारियों के लिए यह बड़ा खतरा था। मजदूर एकजुट होकर अधिकारों की बात करने लगे थे।
इसी समय एक चाल चली गई—एक नए देवता “विश्वकर्मा” की कल्पना की गई। मजदूरों और कारीगरों से कहा गया कि लोहे, मशीनों और औजारों की पूजा करो। भंडारे करवाए गए, तिथियाँ तय की गईं और यह प्रचारित किया गया कि विश्वकर्मा की पूजा से सब काम सफल होंगे। धर्म के नाम पर मजदूरों की असली लड़ाई—रोजगार और न्याय की लड़ाई—को तोड़ दिया गया।
लेकिन सबसे खतरनाक कदम यह था कि इस नकली पूजा की तिथि तय करने के लिए 17 सितंबर चुना गया। यही पेरियार का जन्मदिन था। एक ऐसे नायक का जन्मदिन, जिसने समाज को तर्क करना, सवाल पूछना और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना सिखाया। अंग्रेजों और उच्चवर्णीय मानसिकता वाले सत्ताधारियों ने पेरियार की लोकप्रियता से भयभीत होकर उनके जन्मदिन को एक “धार्मिक त्योहार” से ढकने की कोशिश की।
इस प्रकार, विश्वकर्मा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बहुजनों को उनके इतिहास और असली नेताओं से काटने की राजनीतिक चाल है।
पेरियार : आत्मसम्मान का प्रतीक
पेरियार का जन्म 17 सितंबर 1879 को इरोड (तमिलनाडु) में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने धार्मिक प्रवचनों और पुराणों में कही बातों पर सवाल उठाए। जब वे काशी गए और पाया कि निःशुल्क भोजन केवल ब्राह्मणों के लिए है, तो यह अनुभव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना। उन्होंने तय किया कि ऐसी भेदभावपूर्ण धार्मिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेंगे।
उनके संघर्ष की कुछ प्रमुख झलकियाँ:
- आत्मसम्मान आंदोलन : पेरियार ने लोगों से कहा कि अपने आत्मसम्मान के लिए खड़े हो। किसी भी देवता, शास्त्र या परंपरा को बिना सवाल किए मत मानो।
- जातिवाद का विरोध : उन्होंने वर्णव्यवस्था और ब्राह्मणवाद को समाज का सबसे बड़ा जहर बताया।
- महिलाओं और दलितों के अधिकार : पेरियार ने विधवा पुनर्विवाह, स्त्रियों की शिक्षा और दलितों के अधिकारों के लिए आंदोलन चलाए।
- कांग्रेस से अलगाव : जब उन्होंने देखा कि कांग्रेस भी जातिगत अन्याय पर मौन है, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और जस्टिस पार्टी व बाद में द्रविड़ कड़गम का नेतृत्व किया।
- भाषाई आंदोलन : 1937 में राजाजी द्वारा तमिलनाडु में अनिवार्य हिंदी थोपे जाने के खिलाफ पेरियार ने ज़बरदस्त आंदोलन किया।
पेरियार का तर्कवादी संदेश
27 फरवरी 1958 को कानपुर की सभा में उन्होंने कहा था:
“इस देश में 3% लोग पूरे संसाधनों पर कब्जा करना चाहते हैं। वे शास्त्रों और पुराणों के नाम पर बहुजनों को गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। तोड़ दो ऐसे ईश्वर की मूर्तियाँ, नष्ट कर दो ऐसे पूजा स्थल, फेंक दो ऐसे ग्रंथ जो तुम्हें छूने से भी मना करते हैं। यह देश तुम्हारा है, आदिवासियों और द्रविड़ों का है, किसी ब्राह्मण या देवता का नहीं।”
यह भाषण आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था कि असली पूजा मूर्तियों में नहीं, बल्कि बुद्धि पर भरोसा करने और ब्राह्मणवादी जाल को तोड़ने में है।
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“सच्ची रामायण” और उत्तर भारत में पेरियार
दक्षिण भारत तक सीमित नहीं, पेरियार के विचार उत्तर भारत में भी पहुँचे। 1968 में ललई सिंह यादव ने उनकी पुस्तक “सच्ची रामायण” का हिंदी अनुवाद किया, जिसमें राम को आर्यों का प्रतिनिधि और दक्षिण के द्रविड़ों का संहारक बताया गया। इस पर यूपी सरकार ने प्रतिबंध लगाया, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मान्यता देते हुए प्रतिबंध हटाया।
इस घटना ने पेरियार को गंगा घाटी तक पहुँचा दिया। गाँव-गाँव उनकी पुस्तिकाएँ पहुँचीं। यद्यपि बाद में राजनीतिक समझौतों ने पेरियार की धारा को कमजोर किया, पर आईआईटी मद्रास में आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल पर प्रतिबंध हटने के बाद फिर से युवाओं में पेरियार की चर्चा बढ़ी।
बहुजन नायकों से ध्यान हटाने की राजनीति
ध्यान दीजिए—17 सितंबर को बहुजन समाज को किस ओर मोड़ा गया?
- पेरियार के आत्मसम्मान और तर्कवादी संदेश से हटाकर उन्हें काल्पनिक “विश्वकर्मा” की पूजा में उलझाया गया।
- मेहनतकश मजदूरों के असली सवाल—रोजगार, मजदूरी, अधिकार—को छिपाकर उन्हें औजारों और मशीनों की मूर्ति-पूजा में लगा दिया गया।
- बहुजनों की मेहनत की कमाई आज भी इसी पूजा और भंडारे में खर्च होती है।
यह साफ़ है कि विश्वकर्मा पूजा कोई धार्मिक सत्य नहीं, बल्कि बहुजनों को मानसिक गुलामी में बनाए रखने का उपकरण है।
तर्क और मानवतावाद की राह
भारत को आगे बढ़ाना है तो हमें तर्क और विज्ञान को पूजा का स्थान देना होगा।
- सवाल पूछना ही सबसे बड़ी पूजा है।
- मूर्तियों की बजाय पुस्तकों को पढ़ना हमारी साधना है।
- अंधविश्वास की बजाय विज्ञान पर भरोसा करना हमारा धर्म है।
डॉ. अंबेडकर और पेरियार ने हमें यही रास्ता दिखाया—समता, बंधुत्व और बुद्धि का रास्ता।
निष्कर्ष : 17 सितंबर की असली विरासत
17 सितंबर को हमें काल्पनिक देवता विश्वकर्मा की नहीं, बल्कि पेरियार की विरासत को याद करना चाहिए। यह दिन हमें यह संकल्प दिलाना चाहिए कि:
- हम किसी भी धर्म या परंपरा को बिना सवाल किए नहीं मानेंगे।
- हम जातिवाद और ब्राह्मणवाद की जड़ों को चुनौती देंगे।
- हम बहुजनों को उनके असली नायकों—पेरियार, डॉ. अंबेडकर, फुले, कांशीराम—से जोड़ेंगे।
हमारी असली पूजा है—आत्मसम्मान, तर्क और सवाल।
यदि हम सचमुच एक जातिविहीन, न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज चाहते हैं, तो पेरियार की राह पर चलना ही एकमात्र विकल्प है।
✍️ यह लेख EthosVoice.com के लिए तैयार किया गया है—जहाँ तर्क, विज्ञान और मानवतावाद को केंद्र में रखकर बहुजन समाज के असली सवालों और नायकों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है।

