(Ideological bias in the judiciary: BJP rule and questions on judicial impartiality)
भारत के लोकतंत्र की सबसे मज़बूत नींवों में से एक न्यायपालिका है। संविधान निर्माताओं ने इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाया ताकि यह कार्यपालिका और विधायिका पर नियंत्रण रख सके और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सके। परंतु पिछले एक दशक में यह आलोचना गहराई से उठने लगी है कि न्यायपालिका, विशेषकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय, अपनी निष्पक्षता खो रहे हैं। आरोप यह है कि भाजपा के शासनकाल में न्यायिक नियुक्तियाँ और फैसले एक खास वैचारिक झुकाव—ब्राह्मणवादी और संघी मानसिकता—की ओर झुकते नज़र आते हैं।
1. न्यायिक नियुक्तियों की राजनीति
कोलेजियम प्रणाली और सरकार का हस्तक्षेप
भारत में जजों की नियुक्ति कोलेजियम प्रणाली से होती है। सिद्धांततः यह प्रणाली स्वतंत्र है, लेकिन व्यवहार में सरकार की सहमति आवश्यक हो जाती है। केंद्र की सत्ता जिस पार्टी के हाथ में होती है, वह अप्रत्यक्ष रूप से यह सुनिश्चित करती है कि ऐसे नामों को प्राथमिकता दी जाए जो उसकी राजनीतिक और वैचारिक सोच के करीब हों।
ब्राह्मणवादी वर्चस्व
सांख्यिकीय दृष्टि से देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों में उच्चवर्णीय, विशेषकर ब्राह्मण और अन्य प्रभु जातियों का वर्चस्व स्पष्ट है। यह असमान प्रतिनिधित्व सामाजिक न्याय और विविधता के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ जाता है।
2. विवादास्पद फैसले और नैतिक प्रश्न
(क) रंजन गोगोई का मामला
• अयोध्या विवाद का फैसला गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनाया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय दिया।
• आलोचकों का कहना है कि यह फैसला न्यायिक तर्क से अधिक राजनीतिक और सांस्कृतिक दबावों से प्रभावित था।
• सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद गोगोई को भाजपा सरकार ने राज्यसभा सदस्य नियुक्त कर दिया—जिससे यह संदेह और गहरा हो गया कि क्या उनका निर्णय निष्पक्ष था।
(ख) चन्द्रचूड़ और उदारवाद का भ्रम
• डी.वाई. चन्द्रचूड़ को “उदारवादी” और “प्रगतिशील” जज माना जाता है।
• उन्होंने प्रजनन अधिकार, निजता और महिलाओं के अधिकारों पर कई ऐतिहासिक निर्णय दिए।
• परंतु हाल ही में चुनावी बॉन्ड और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मामलों में उनकी बेंच पर यह आरोप लगा कि उन्होंने सुनवाई में अनावश्यक देरी की या सरकार के पक्ष में लचीलापन दिखाया।
(ग) अन्य निर्णय
• कश्मीर 370 हटाना,
• भीमा कोरेगांव के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर हस्तक्षेप न करना,
• पत्रकारों और कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारियों को वैध ठहराना,
• इलेक्टोरल बॉन्ड्स को लंबे समय तक अप्रभावी छोड़ना—
इन सबने मिलकर न्यायपालिका पर यह धब्बा गहरा कर दिया कि वह भाजपा सरकार की नीतियों को चुनौती देने के बजाय उन्हें वैधता प्रदान करती है।
3. न्यायपालिका और वैचारिक झुकाव
संघी मानसिकता का आरोप
RSS और भाजपा की विचारधारा “हिंदू राष्ट्र” के निर्माण की दिशा में काम करती है। जब अदालतें राम मंदिर, धर्मांतरण कानूनों, NRC, या धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मामलों में सरकार या बहुसंख्यकवाद के पक्ष में झुकती हैं, तो यह संदेह मजबूत होता है कि न्यायिक तर्कसंगति के बजाय वैचारिक दबाव हावी है।
पोस्ट-रिटायरमेंट नियुक्तियाँ
न्यायाधीशों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद आयोगों, राज्यसभा, या गवर्नर पद जैसी नियुक्तियाँ एक तरह का “इनाम” प्रतीत होती हैं। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
4. लोकतंत्र पर प्रभाव
1. नागरिकों का भरोसा टूटना
जब अदालतें पक्षपातपूर्ण दिखती हैं, तो आम नागरिक न्यायपालिका पर विश्वास खोने लगते हैं।
2. संवैधानिक संतुलन का संकट
न्यायपालिका कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने के बजाय उसका विस्तार बन जाए, तो संवैधानिक ढांचा खोखला हो जाता है।
3. अल्पसंख्यकों और वंचितों की असुरक्षा
न्यायपालिका अगर बहुसंख्यकवादी राजनीति को वैध ठहराती है, तो अल्पसंख्यक समुदायों और वंचित वर्गों के अधिकार गंभीर खतरे में पड़ जाते हैं।
5. क्या होना चाहिए?
• न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता: कोलेजियम प्रणाली में अधिक पारदर्शिता और सामाजिक विविधता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
• पोस्ट-रिटायरमेंट पदों पर रोक: जजों को सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पद लेने पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए।
• जनता के प्रति जवाबदेही: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को अपने निर्णयों में राजनीतिक और वैचारिक निष्पक्षता दिखानी होगी।
• सिविल सोसाइटी की निगरानी: मीडिया, शिक्षाविद और नागरिक समाज को न्यायपालिका के कामकाज पर खुलकर सवाल उठाने चाहिए।
निष्कर्ष
भाजपा शासनकाल में न्यायपालिका पर यह आरोप लगातार गहराता जा रहा है कि उसके कई निर्णय और नियुक्तियाँ ब्राह्मणवादी और संघी मानसिकता से प्रभावित हैं। चाहे वह गोगोई का राज्यसभा जाना हो या हाल के संवेदनशील मामलों में अदालतों का सरकार के प्रति नरम रवैया—इन सबने न्यायपालिका की निष्पक्षता को संदिग्ध बना दिया है।
अगर भारत का लोकतंत्र मज़बूत रखना है तो न्यायपालिका को सत्ता से स्वतंत्र रहना होगा। अन्यथा संविधान की रक्षा करने वाली यही संस्था लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी।


यह एक अत्यंत विचारणीय और महत्वपूर्ण विषय उठाया है आपने। भारत की न्यायपालिका, जिसे संविधान का संरक्षक माना जाता है, पर ऐसे गंभीर सवालों का उठना स्वयं लोकतंत्र के लिए एक गहन चिंतन का विषय है।
आपके विश्लेषण में उल्लेखित कई बिंदु—जैसे नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका की भूमिका, पदोन्नति और सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियों का मुद्दा, और कुछ ऐतिहासिक निर्णयों पर सार्वजनिक बहस—वास्तव में न्यायिक स्वतंत्रता पर उठने वाले प्रश्नचिह्नों को गहरा करते हैं।
हालाँकि, यहाँ एक द्वंद्व भी है। एक ओर, यह आवश्यक है कि न्यायपालिका लोकभावना और सामाजिक न्याय के प्रति संवेदनशील बनी रहे और उसमें विविधता भी हो। वहीं दूसरी ओर, यह भी ख्याल रखना होगा कि न्यायाधीशों के निजी या वैचारिक झुकाव पर *किए जाने वाले आरोप* सटीक सबूतों और उनके निर्णयों के कानूनी तर्क पर आधारित हों, न कि केवल उनके नतीजों पर। कई बार, संविधान का एक ही प्रावधान अलग-अलग सन्दर्भों में अलग-अलg तरीके से व्याख्या की मांग करता है।
मुझे लगता है कि इस समस्या का मूल समाधान Collegium System में पारदर्शिता और जवाबदेही के ठोस मानकों को स्थापित करने में निहित है, न कि केवल कार्यपालिका के दखल को बढ़ाने या घटाने में। एक मजबूत लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है कि न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बना रहे, और यह विश्वास तभी कायम रह सकता है जब नियुक्तियों और निर्णयों की प्रक्रिया निष्पक्ष और पक्षपातरहित नज़र आए।
यह एक ऐसा विषय है जिस पर हर लोकतंत्रप्रेमी नागरिक का ध्यान जाना चाहिए। आपने एक बहुत ज़रूरी बहस छेड़ी है।