(Martyrdom of Jagdev Prasad: A document of the incomplete fight for social justice)
जगदेव प्रसाद की शहादत केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि उस दौर के सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष की धड़कन पर सीधा प्रहार था। 5 सितंबर 1974 को बिहार के जहानाबाद जिले के कुर्था प्रखंड में हजारों प्रदर्शनकारियों के बीच जब उन्हें गोली मारी गई, तब वे दो बार विधायक रह चुके थे और तीन सरकारों में मंत्री भी। वे केवल एक जननेता नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक दृष्टिकोण वाले चिंतक थे।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गोली लगने के बाद वे जीवित थे, लेकिन पुलिस उन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय थाने घसीट ले गई, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई। इतना ही नहीं, उनके शव को छिपाने की कोशिश की गई, जिसे पटना से आए राजनीतिक दबाव के बाद ही सार्वजनिक किया गया।
🔥 सामाजिक उथल-पुथल की पृष्ठभूमि
यह घटना उस समय हुई जब बिहार सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। भोजपुर और आसपास के क्षेत्रों में दलित, भूमिहीन किसान और मजदूर सामंती वर्चस्व के खिलाफ अपनी मानवता और अधिकारों के लिए खड़े हो रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में 1974 का जेपी आंदोलन आकार ले रहा था, लेकिन जगदेव प्रसाद की लड़ाई उस मुख्यधारा से अलग थी।
वे शोषित समाज दल के बैनर तले नारा दे रहे थे—“सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।” उनका एजेंडा केवल भ्रष्टाचार या बेरोजगारी तक सीमित नहीं था, बल्कि जाति आधारित सामाजिक ढांचे को तोड़कर वास्तविक सामाजिक-आर्थिक न्याय स्थापित करना था।
🧠 वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक यात्रा
1960 के दशक के उत्तरार्ध में जब कांग्रेस के लंबे एकाधिकार के खिलाफ गठबंधन सरकारें बन रही थीं, छात्र आंदोलन, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनउभार हो रहा था, और नक्सलबाड़ी से प्रेरित क्रांतिकारी धाराएँ उभर रही थीं—तब जगदेव प्रसाद ने देखा कि लोहियावादी और वामपंथी राजनीति भी अपनी सीमाओं में बंधी हुई है। इसी अनुभव से उन्होंने शोषित दल की स्थापना की, जो किसी अवसरवादी सत्ता खेल का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक नए वैचारिक-राजनीतिक मार्ग की खोज थी।
उनका स्पष्ट मत था कि भारत में असली वर्ग संघर्ष 10% शोषक सवर्णों और 90% शोषित दलित-पिछड़े-आदिवासी-मुसलमानों के बीच है।
🤝 दो धाराओं का संगम
उस समय बिहार में दो समानांतर धाराएँ सक्रिय थीं—एक, जगदेव प्रसाद की संसदीय राजनीति, जो शोषितों के हिस्से की खुली मांग कर रही थी; और दूसरी, मास्टर जगदीश महतो, रामनरेश राम और रमेश्वर अहिर के नेतृत्व में भोजपुर में चल रही गैर-संसदीय लड़ाई। इन दोनों धाराओं ने मिलकर सवर्ण सामंती आतंक और वर्चस्व को चुनौती दी।
📚 आंदोलन के मुद्दे और दृष्टिकोण
जगदेव प्रसाद की राजनीति किसी एक जाति के मध्यवर्गीय हितों तक सीमित नहीं थी। वे दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, मुसलमानों और अन्य वंचित वर्गों को एक साझा राजनीतिक मंच पर संगठित करने का प्रयास कर रहे थे। उनके आंदोलन के केंद्र में भूमि सुधार, बटाई कानून, खेत मजदूरी अधिनियम, आरक्षण, समान शिक्षा और डॉ. अंबेडकर के साहित्य का प्रसार था।
सहार प्रखंड में दिए गए उनके भाषण में उन्होंने कहा था—“पूरा बिहार को सहार बनाना है,” जो सामाजिक क्रांति का सीधा आह्वान था।
⚖️ शहादत का अर्थ और आज की प्रासंगिकता
5 सितंबर 1974 को उनकी हत्या के पीछे केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक घृणा और भय छिपा था—वह भय कि अगर उनकी राजनीति आगे बढ़ी, तो सदियों पुराना सामाजिक ढांचा हिल जाएगा। उनकी शहादत ने उस युग की राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया, लेकिन उनका नारा और दृष्टिकोण आज भी जीवित है।
“सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है” केवल एक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के अधूरे एजेंडे की याद दिलाने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज है।
आज जब हम बिहार और पूरे हिंदी पट्टी की राजनीति को देखते हैं, तो पाते हैं कि जगदेव प्रसाद का संघर्ष केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक मार्गदर्शक है। उनकी बातें और उनकी शहादत हमें यह समझाती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सत्ता संरचना में वास्तविक भागीदारी और समान अवसर से जीवित रहता है—और यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

